जैन धर्म में कितने दर्शन बताये गये है
जैन धर्म में “दर्शन” शब्द दो तरह से आता है, इसलिए पहले यह स्पष्ट करना ज़रूरी है कि आप किस अर्थ में पूछ रहे हैं:
1) तत्त्व या द्रव्य के रूप में “दर्शन” नहीं गिना जाता जैन दर्शन में जो मुख्य वास्तविकताएँ गिनाई जाती हैं, वे हैं: - 6 द्रव्य – जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश, काल - 7 तत्त्व – जीव, अजीव, आस्रव, बंध, संवर, निर्जरा, मोक्ष - 9 तत्त्व – ऊपर के 7 + पुण्य, पाप
इन सूचियों में “दर्शन” एक अलग गिनती के रूप में नहीं जोड़ा जाता।
2) ज्ञान के जैसे “दर्शन के प्रकार” (कितने दर्शन हैं?) अगर आपका प्रश्न यह है कि जैन दर्शन में “दर्शन” के कितने प्रकार बताए हैं, तो आम तौर पर दो मुख्य तरह से बताया जाता है:
(क) ज्ञान की तरह दर्शन के भेद (5 ज्ञान, 4 दर्शन) जैसे 5 ज्ञान माने गए हैं, वैसे ही 4 दर्शन माने जाते हैं: 1. चक्षु-दर्शन (आँख से देखना) 2. अचक्षु-दर्शन (आँख के बिना – अन्य इन्द्रियों से अनुभव) 3. अवधि-दर्शन (सीमित दूरी/वस्तु तक का दैवी दर्शन) 4. केवली-दर्शन (केवलज्ञान वाले का अनन्त, पूर्ण दर्शन)
यहाँ “दर्शन” का अर्थ है – देखने / अनुभव करने की शक्ति।
(ख) सम्यक/मिथ्या दर्शन के भेद श्रद्धा/विश्वास के रूप में भी “दर्शन” के भेद बताए जाते हैं, जैसे: - मिथ्यात्व (गलत दर्शन) के भेद - सम्यक्त्व (सम्यक दर्शन) के भेद पर इन्हें “कुल कितने दर्शन हैं?” की गिनती की तरह सामान्यतः नहीं पूछा जाता, बल्कि “मिथ्यात्व के कितने भेद हैं?” इस प्रकार से अलग प्रश्न होते हैं।
संक्षेप उत्तर (आपके प्रश्न के सबसे निकट अर्थ में): अगर आप “जैन धर्म में कितने दर्शन बताए गए हैं?” से दर्शन की शक्तियाँ पूछ रहे हैं, तो जैन दर्शन में 4 प्रकार के दर्शन बताए गए हैं – 1) चक्षु-दर्शन 2) अचक्षु-दर्शन 3) अवधि-दर्शन 4) केवली-दर्शन
जैन तत्वज्ञान, द्रव्य आदि पर सरल नोट्स के लिए आप यहाँ देख सकते हैं