भगवान महावीर को पारण कराने के पश्चात क्या चंदनबाला महाराज शतानिक एवं मासी मृगावती के साथ गयी
आपका प्रश्न बहुत अच्छा है और अक्सर पूछा जाता है।
संक्षेप में उत्तर:
- आगमों (मूल जैन शास्त्रों) में चंदनबाला द्वारा भगवान महावीर को आहार कराने की घटना तो आती है,
- बाद की कथाओं (चरित्र‑ग्रंथों, प्रवचन‑कथाओं) में दो प्रकार के उल्लेख मिलते हैं:
1. कुछ कथाओं में लिखा है कि भगवान के अभिग्रह पूर्ण होने पर देवों के प्रभाव से उसकी बेड़ियाँ टूट गईं, रूप फिर से राजकुमारी जैसा हो गया, शतानिक राजा और मृगावती रानी आए, पहचान हुई और वे उसे महल ले गए, जहाँ वह राजकुमारी के रूप में रहने लगी; बाद में भगवान महावीर के केवलज्ञान के समय वह दीक्षा लेकर प्रथम साध्वी बनी।
2. दूसरी परंपराओं में यह भी लिखा मिलता है कि शतानिक और मृगावती ने उसे महल चलने के लिए कहा, पर चंदनबाला को गहरा वैराग्य हो चुका था, इसलिए उसने महल जाने से इनकार किया और वहीं रहकर भगवान से दीक्षा लेने की प्रतीक्षा की और आगे चलकर साध्वी‑संघ की प्रमुख बनी।
इसलिए सीधा, एक ही उत्तर देना संभव नहीं है कि “ज़रूर गई” या “कदापि नहीं गई” – क्योंकि दोनों प्रकार की कथाएँ प्रचलित हैं, और मूल आगम इस बिंदु को विस्तार से नहीं बताते।
जैन परंपरा में मुख्य बात यह मानी जाती है कि:
- चंदनबाला ने अपरम्पार दुख और दासता के बीच भी धर्म, संयम और दान की महान भावना दिखाई,
- भगवान महावीर को आहार देकर उनके कठिन अभिग्रह को पूर्ण करवाया,
- आगे चलकर वह महासती / प्रथम साध्वी बनी और मोक्ष प्राप्त किया।
यही इस प्रसंग का मुख्य आध्यात्मिक संदेश है; महल गई या नहीं – इस पर परंपराओं में भिन्न‑भिन्न कथन मिलते हैं।
महावीर स्वामी के पारण से संबंधित संक्षिप्त जानकारी यहाँ भी देख सकते हैं