बौध धर्म में बुद्धम शरणं कहा जाता है भगवान महावीर के धर्म में क्या कहा जाता है
बौद्ध धर्म में जैसे “बुद्धं शरणं गच्छामि, धम्मं शरणं गच्छामि, संघं शरणं गच्छामि” कहा जाता है, वैसे ही जैन धर्म में भगवान महावीर के बताये मार्ग पर “शरण” का भाव मुख्य रूप से नवकार (णमोकार) मंत्र और पंच परमेष्ठी के माध्यम से व्यक्त किया जाता है।
जैन धर्म में शरण किस रूप में ली जाती है?
मुख्य रूप से इस तरह:
1. नवकार मंत्र (सबसे मुख्य शरण मंत्र) यह किसी एक देवता नहीं, बल्कि सभी पंच परमेष्ठी की शरण ग्रहण है:
- णमो अरिहंताणं – मैं अरिहंतों को नमस्कार करता हूँ
- णमो सिद्धाणं – मैं सिद्धों को नमस्कार करता हूँ
- णमो आयरियाणं – मैं आचार्यों को नमस्कार करता हूँ
- णमो उवज्झायाणं – मैं उपाध्यायों को नमस्कार करता हूँ
- णमो लोए सव्वसाहूणं – मैं संसार के सभी साधु‑साध्वी को नमस्कार करता हूँ
यह पाँचों शरण लेकर ही आगे कहा जाता है कि यह पंच‑नमस्कार सब पापों का नाश करने वाला और सबसे महान मंगल है।
2. “अरिहंतं सरणं पवज्जामि…” (चारि ठवण / षडूव सरण) जैन आगमों में शरण‑सूत्र के रूप में यह भाव मिलता है:
- अरिहंतं सरणं पवज्जामि – मैं अरिहंत की शरण लेता हूँ
- सिद्धं सरणं पवज्जामि – मैं सिद्ध की शरण लेता हूँ
- साहूं सरणं पवज्जामि – मैं साधु की शरण लेता हूँ
- केवली‑पण्णत्तं धम्मं सरणं पवज्जामि – मैं केवलियों (सर्वज्ञों) द्वारा प्रतिपादित धर्म की शरण लेता हूँ
अर्थात् जैन में शरण का केन्द्र है:
- अरिहंत
- सिद्ध
- आचार्य, उपाध्याय, साधु (संघ)
- और केवलज्ञानी द्वारा बताये हुए धर्म
इसी को हम संक्षेप में कहते हैं कि जैन धर्म में “शरण” लेना मतलब पंच परमेष्ठी और उनके बताये धर्म की शरण लेना है – जिसका प्रकट रूप है नवकार मंत्र का जप और पालन।