Sadbhaktya devloke sutra
लगता है आप जिस सूत्र की बात कर रहे हैं, वह “सद्भक्त्या देवलोके…” नहीं, बल्कि चैत्यवंदन की पहली पंक्ति है, जो इस तरह है:
मूल सूत्र (संस्कृत/प्राकृत रूप) > सहवं देवलोके रवि‑शशि‑भुवने व्यन्तराणां निकाये, > नक्षत्राणां निवासे अह‑गण‑पटलॆ तारकाणां विमाने। > पाताले पन्नगेन्द्रे स्फुट‑मणि‑किरणे ध्वस्त‑मिथ्याऽन्धकारे, > श्रीमत् तीर्थंकराणां प्रति‑दिवसमहं तत्र चैत्यानि वन्दे॥
(कुछ पाठों में “सहवं” की जगह “सर्वं” भी मिलता है, भाव वही है।)
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सरल अर्थ (अर्थ)
बहुत सरल भाषा में:
- देवलोक में,
- सूर्य‑चन्द्रमा के लोक (भुवन) में,
- व्यन्तर देवों के समूहों में,
- नक्षत्रों के निवास‑स्थानों में,
- आकाश में फैले तारे‑ग्रहों के विमानों में,
- पाताल में, नागों (पन्नगेन्द्र) के लोकों में,
- जहाँ चमकते रत्नों की किरणों से मिथ्या‑दर्शन रूप अन्धकार नष्ट हो रहा है,
ऐसे तीनों लोकों (ऊर्ध्व, मध्य, अधो) में जहाँ‑जहाँ श्री तीर्थंकर भगवान के चैत्य (जिनालय/मंदिर/प्रतिमाएँ) हैं, मैं प्रतिदिन उन सभी चैत्यो को नमस्कार करता हूँ।
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भावार्थ (आध्यात्मिक भावना)
- यह सूत्र बताता है कि केवल पृथ्वी पर ही नहीं, तीनों लोकों में अनन्त स्थानों पर तीर्थंकर भगवान के प्रतीक‑रूप चैत्य/मंदिर/प्रतिमाएँ हैं।
- साधक यह भावना करता है कि मैं हर दिन – हर लोक, हर दिशा, हर स्थान पर स्थित सभी जिन‑चैत्य को हृदय से नमस्कार करता हूँ।
- इससे अनन्त जिनेन्द्रों के प्रति सार्वत्रिक (सर्वव्यापी) श्रद्धा और सम्यक् भक्ति का विकास होता है, और मिथ्या‑दर्शन / अज्ञान का अन्धकार नष्ट करने की प्रेरणा मिलती है।
यदि आप चाहें तो मैं पूरी “चैत्यवन्दना” की सभी गाथाएँ भी शुद्ध पाठ और सरल अर्थ सहित दे सकता हूँ।