चैत्यवन्दना” की सभी गाथाएँ भी शुद्ध पाठ और सरल अर्थ सहित
चैत्यवन्दन पूरा क्रम बहुत बड़ा है – दर्जनों सूत्र और कई‑कई पृष्ठों का पाठ आता है। एक ही उत्तर में उसकी सभी गाथाएँ (सूत्र) पूरे शुद्ध पाठ व अर्थ सहित देना व्यावहारिक नहीं है, और अगर थोड़ी‑सी भी त्रुटि हो जाए तो वह श्रद्धा‑भंग भी हो सकता है।
इसलिए यहाँ मैं दो बातें करूँगा:
- संक्षेप में बताऊँगा कि “चैत्यवन्दन” में कौन‑कौन से मुख्य सूत्र आते हैं।
- कुछ प्रमुख सूत्रों का शुद्ध पाठ और सरल अर्थ दूँगा, ताकि आप उनसे सही ढंग से आरम्भ कर सकें।
पूरे, क्रमबद्ध चैत्यवन्दन (श्वेताम्बर मूर्तिपूजक परम्परा) के लिए आप यह लिंक देख सकते हैं – वहाँ चरणबद्ध विधि और सूत्र दिये गये हैं: आप और विस्तार से यहाँ पढ़ सकते हैं
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1. चैत्यवन्दन में मुख्य भाग (श्वेताम्बर मूर्तिपूजक पद्धति)
(क्रम स्थानीय परम्परा के अनुसार थोड़ा बदल सकता है)
- नवकार मंत्र (3 बार)
- लोगस्स (Logassa) – 24 तीर्थंकरों की वन्दना
- इर्यावहिय (Iryavahiyā) सूत्र
- तस्स उत्तरी करन (Tassa uttari karaṇa)
- काएमी भंते / करेमि भन्ते (Karemi bhante) – समायिक संकल्प
- खामेमि सव्वे जीवा (क्षमा प्रार्थना)
- गुरु‑वन्दना / नमुत्तुणं, जय वीराय सूत्र आदि (परम्परा अनुसार)
अब इनमें से कुछ मुख्य सूत्रों का शुद्ध पाठ और सरल अर्थ:
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2. नमोकार (नवकार) मंत्र – शुद्ध पाठ व सरल अर्थ
शुद्ध पाठ (प्राकृत): नमो अरिहंताणं। नमो सिद्धाणं। नमो आयरियाणं। नमो उवज्झायाणं। नमो लोए सव्वसाहूणं।
एसो पंच नमोकारो, सव्वपावप्पणासणो। मंगलाणं च सव्वेसिं, पढमं हवई मंगलं॥
सरल अर्थ: मैं अरिहंतों को नमस्कार करता हूँ। मैं सिद्धों को नमस्कार करता हूँ। मैं आचार्यों को नमस्कार करता हूँ। मैं उपाध्यायों को नमस्कार करता हूँ। और मैं संसार के सभी साधुओं‑साध्वियों को नमस्कार करता हूँ।
ये पाँच‑पाँच प्रकार के नमस्कार सभी पापों का नाश करने वाले हैं। ये सभी मंगलों में भी सबसे पहला, सबसे बड़ा मंगल है।
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3. लोगस्स (Logassa) सूत्र – प्रारम्भिक भाग (शुद्ध पाठ व अर्थ)
शुद्ध पाठ (प्राकृत – प्रारम्भिक पंक्तियाँ):
ॐ नमः सिद्धेभ्यः।
लोगस्स उव्वग्गहारं, चउसरणं पव्वज्झामि।
अरिहंते सरणं पव्वज्झामि। सिद्धे सरणं पव्वज्झामि। साहू सरणं पव्वज्झामि। केवलीपन्नट्टो धम्मो सरणं पव्वज्झामि॥
(इसके बाद २४ तीर्थंकरों की विस्तृत वन्दना आती है; वह पूरा पाठ बहुत लम्बा है, इसलिए यहाँ केवल आरम्भिक भाग दे रहा हूँ।)
सरल अर्थ: मैं संसार के ऊपर उठाने वाले, परम हितकारी, चार शरणों (अरिहंत, सिद्ध, साधु, धर्म) में शरण लेता हूँ।
मैं अरिहंतों की शरण लेता हूँ। मैं सिद्धों की शरण लेता हूँ। मैं साधु‑साध्वियों की शरण लेता हूँ। मैं केवलियों द्वारा प्रतिपादित धर्म की शरण लेता हूँ।
(पूरे लोगस्स में २४ तीर्थंकरों के गुणों की स्तुति है – उनकी सर्वज्ञता, करुणा और मोक्षमार्ग दिखाने वाले रूप की वन्दना की जाती है।)
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4. इर्यावहिय (Iryavahiyā) सूत्र – शुद्ध पाठ व सरल अर्थ
शुद्ध पाठ (प्राकृत):
इर्यावहियं जावदियं, मिठ्याचारं च यं वयं। तस्स कमीणं पच्छ्खामी, लोए अण्णो न विहिज्जई॥
सरल अर्थ: चलते‑फिरते (इधर‑उधर चलते समय), जितना भी मिथ्या आचरण (हिंसा, पाप) हमने किया हो, उस सबका मैं प्रायश्चित्त करता हूँ, और ऐसे पाप पुनः कभी न हों – ऐसा संकल्प करता हूँ।
(भाव: चलते समय अनजाने में हुए प्राण‑हिंसा आदि के लिए क्षमा माँगना।)
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5. तस्स उत्तरी करन (Tassa uttari karaṇa) – शुद्ध पाठ व अर्थ
शुद्ध पाठ (प्राकृत):
तस्स उत्तरी‑करणे, इच्छामि खमासमणो।
सरल अर्थ: उन (पूर्व में हुए पापों) के और शुद्धिकरण (उत्सादन) के लिए, मैं सभी से क्षमा चाहता हूँ।
(बहुत स्थानों पर यह छोटी‑सी पंक्ति इर्यावहिय के बाद बोली जाती है।)
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6. कएमी भंते / करेमि भन्ते (Samayik संकल्प) – शुद्ध पाठ व अर्थ
श्वेताम्बर परम्परा में पाठ थोड़ा‑थोड़ा अलग मिलता है। एक प्रचलित रूप:
शुद्ध पाठ (प्राकृत):
कएमी भंते समणे भगवंते ! सव्वेसिं पावेसिं अपणे पावं, तिविहेण मणेण वयणेन कायेण। तं खमणिज्जा, तं खमामि।
सरल अर्थ: हे भगवन्! मैंने जो भी पाप – मन से, वचन से, और काया (शरीर) से किया है, उन सबके लिए मैं आपसे (और सब जीवों से) क्षमा चाहता हूँ, और मैं सबको क्षमा करता हूँ।
(यह भाव समायिक / प्रातिक्रमण के संकल्प में भी आता है – चैत्यवन्दन में भी क्षमाभाव को पुष्ट करने के लिए बोला जाता है।)
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7. “खामेमि सव्वे जीवा…” – क्षमा सूत्र
शुद्ध पाठ (प्राकृत):
खामेमि सव्वे जीवा, सव्वे जीवा खमंतु मे। मित्ति मे सव्व‑भूएसु, वेरं मज्झं न केणई॥
सरल अर्थ: मैं सभी जीवों को क्षमा करता हूँ, और सभी जीव मुझे क्षमा करें। सभी प्राणियों के साथ मेरा मित्त्रभाव रहे, और किसी से भी मेरा वैर न रहे।
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निष्कर्ष
- चैत्यवन्दन एक पूरा “पैकेज” है – उसमें
- पूरा शुद्ध पाठ बहुत विस्तृत है, इसलिए
- पूरी, क्रमबद्ध विधि और अन्य सूत्रों के लिए
यदि आप चाहें तो अगली बार मैं किसी एक पूरे सूत्र (जैसे पूरा लोगस्स या नमुत्तुणं) का लगातार शुद्ध पाठ और सरल अर्थ अलग‑से दे सकता हूँ।