Amarkanka nagri ko devta ne banaya aur wo nashta nhi hui ....ye sahi hai kya
जैन दर्शन के अनुसार यह बात सही नहीं है कि “किसी देव ने कोई नगरी (जैसे ‘अमरकंक नगरी’) बनाई हो और वह कभी नष्ट ही नहीं होती।”
जैन सिद्धांत बहुत साफ़ है:
- संसार की हर बनाई हुई वस्तु अनित्य (अस्थायी) है
- जो भी रूप-विकारी पदार्थ है – शहर, देवलोक की भव्य नगरियाँ, विमान, देह, पर्वत, भवन – सब बदलने वाले हैं, एक समय पर नष्ट हो जाते हैं। - बारह भावनाओं में “अनित्य भावना” और “लोक भावना” में यही सिखाया जाता है कि रूप, अवस्था, संघटन – सब नश्वर हैं।
- देवों की नगरी भी शाश्वत (हमेशा रहने वाली) नहीं होती
- देवलोक में दिव्य भवन और नगरियाँ बहुत दीर्घकाल तक रहती हैं, परन्तु वे भी उत्पत्ति–व्यय के नियम से बंधी हैं। - देव स्वयं भी अनंत काल तक एक ही देह में नहीं रहते; उनका आयुष्य पूरा होता है, फिर अन्य गति में जाते हैं। - इसलिए “देव ने बनाया और वह कभी नष्ट नहीं होती” – यह जैन सिद्धांत के विरुद्ध है।
- क्या शाश्वत है?
- द्रव्य (जैसे जीवद्रव्य, पुद्गलद्रव्य, धर्म, अधर्म, आकाश, काल) अपने द्रव्य–रूप से नित्य हैं, पर उनकी अवस्थाएँ (संरचना, शहर, देह, वस्तु) अनित्य हैं। - केवल सिद्धों की अवस्था (मोक्ष), लोकाकाश आदि का द्रव्य–रूप नित्य कहा जाता है, पर वहाँ भी जो भी “रूप वाला संयोजन” हो, वह अनित्य नियम से बंधा माना जाता है।
इसलिए निष्कर्ष:
- “अमरकंक/अमरकंटक” जैसी किसी भी नगरी को किसी देव ने ऐसा नहीं बनाया हो सकता कि वह कभी नष्ट न हो।
- यह बात जैन दृष्टि से गलत (अतिशयोक्ति/कथा) है, क्योंकि जैन धर्म में सब संसारिक रूप अनित्य और नश्वर माने गए हैं।