तीर्थ का मुख्य भेद क्या है in jainism
जैन धर्म में “तीर्थ” के दो मुख्य भेद (अर्थ) माने जाते हैं:
- संघ‑रूप तीर्थ (मुख्य / मूल अर्थ)
आगमों में तीर्थ का मुख्य अर्थ है – चतुर्विध संघ - साधु - साध्वी - श्रावक - श्राविका
जब तीर्थंकर भगवान यह चारों संघ स्थापित कर देते हैं, तब वह पूरा संघ “तीर्थ” कहलाता है, क्योंकि उसी के सहारे जीव संसार‑सागर से “पार” जा सकता है। यही तीर्थ का मूल और प्रधान अर्थ है – धर्मसंघ = तीर्थ।
- क्षेत्र‑रूप तीर्थ (व्यवहार का सामान्य अर्थ)
व्यवहार में लोग “तीर्थ” शब्द को पवित्र स्थान / यात्रा‑स्थल के लिए बोलते हैं, जहाँ जाकर पूजा, तप, स्वाध्याय आदि किए जाते हैं। ऐसे तीर्थक्षेत्रों के मुख्य भेद साधारण रूप से इस प्रकार बताए जाते हैं –
- सिद्धक्षेत्र (निर्वाण‑तीर्थ) – जहाँ तीर्थंकर या अरिहंत को मोक्ष मिला हो - कल्याणक‑क्षेत्र – जहाँ गर्भ, जन्म, दीक्षा, केवलज्ञान आदि कल्याणक हुए हों - अतिशय‑क्षेत्र – जहाँ किसी प्रकार के चमत्कार / अतिशय की प्रसिद्धि हो
(कुछ ग्रंथों में ज्ञानक्षेत्र आदि का भी उल्लेख मिलता है, पर ऊपर के तीन भेद सबसे ज़्यादा प्रचलित हैं।)
संक्षेप में:
- शास्त्रीय रूप से: चतुर्विध संघ ही तीर्थ का मुख्य भेद (अर्थ) है।
- व्यवहार में: तीर्थक्षेत्र तीन प्रमुख प्रकार के – सिद्धक्षेत्र, कल्याणक‑क्षेत्र, अतिशय‑क्षेत्र माने जाते हैं।