jain stavans with meanings?
जैन धर्म में “स्तवन” का मतलब है – भगवान, तीर्थंकर, पंच परमेष्ठी या धर्म के गुणों की स्तुति करना (भक्ति-गीत / भजन के रूप में)। ये भाषा कोई भी हो सकते हैं – संस्कृत, प्राकृत, हिंदी, गुजराती आदि – पर भाव हमेशा आत्म-शुद्धि और गुण-स्मरण का होता है, न कि सांसारिक चीज़ें माँगने का।
नीचे कुछ प्रसिद्ध जैन स्तवन / स्तोत्र और उनका सरल अर्थ दिया है:
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1. णमोकार मन्त्र (नवकार मन्त्र – अक्सर स्तवन की तरह गाया जाता है)
मूल पाठ (संक्षेप में): णमो अरिहंताणं । णमो सिद्धाणं । णमो आयरियाणं । णमो उवज्जायाणं । णमो लोए सव्वसाहूणं ॥
सरल अर्थ: मैं नमन करता हूँ –
- अरिहंतों को (जो कषायों का नाश कर चुका है),
- सिद्धों को (जो मोक्ष को प्राप्त हो चुके हैं),
- आचार्यों को,
- उपाध्यायों को,
- और संसार के सभी सच्चे साधु-साध्वियों को।
यह स्तवन किसी एक व्यक्ति की नहीं, गुणों की वंदना है। इससे नम्रता, सम्यक दर्शन और मोक्षमार्ग की स्मृति बढ़ती है।
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2. क्षमापना / “खामेमि सव्वे जीवे…”
इसे भी कई जगह पर भक्ति-भाव से गाया जाता है, इसलिए व्यवहार में इसे भी लोग स्तवन जैसा ही मानते हैं।
मूल पाठ: खामेमि सव्वे जीवे, सव्वे जीवा खमंतु मे । मित्ती मे सच्च-भूएसु, वैरं मज्झं न केणइ ॥
सरल अर्थ:
- मैं सभी जीवों को क्षमा करता हूँ,
- सभी जीव भी मुझे क्षमा करें।
- मेरे लिए सभी सच्चे भाव वाले जीव मित्र हैं,
- और किसी के साथ मेरा वैर न रहे।
इसका मुख्य भाव है – आत्म-शुद्धि, अहिंसा, और राग-द्वेष का क्षय। यह जैन क्षमापना-धर्म का सार है।
आप इसे पूरे अर्थ सहित यहाँ देख सकते हैं
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3. भक्तामर स्तोत्र (उदाहरण – एक श्लोक और अर्थ)
भक्तामर पूरा स्तोत्र है, पर इसे भी स्वरों में गाकर स्तवन की तरह ही किया जाता है। उदाहरण के लिए – श्लोक 30 (कुन्दावदात…):
(संस्कृत से अंश): कुन्दावदात-चल-चामर-चारु-शोभं, विभ्राजते तव वपुः कलधौत-कान्तम् …
सरल भावार्थ: हे प्रभु!
- श्वेत कुंद पुष्प जैसे उज्ज्वल चँवर लहराते हैं,
- उनके बीच आपका सुनहिरा, निर्मल शरीर बहुत ही सुंदर प्रकाशित हो रहा है,
अर्थात – तीर्थंकर की शांत, निर्मल, दिव्य देह और तेज का वर्णन है, जो साधक के मन में भक्ति और श्रद्धा उत्पन्न करता है, और हमें आत्म-परिष्कार की प्रेरणा देता है, क्योंकि यह सारी महिमा अंततः आत्मगुणों की है।
भक्तामर के कई श्लोकों का अर्थ सहित विवरण यहाँ है (इसी साइट पर अन्य श्लोकों के अर्थ भी उपलब्ध हैं)
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4. जैन भजन / स्तवन (हिंदी – उदाहरण “पंच परमेष्ठी की महिमा”)
यह एक लोकप्रिय भजन है जो पंच परमेष्ठी की महिमा गाता है:
अंश: जय जय भविजन-बोध-विधाता, जय जय आत्म-शुद्धि-विधाता, जय भवभंजनहार, परमेष्ठी ॥
सरल अर्थ: हे पंच परमेष्ठी!
- आप संसार के जीवों को सच्चा धर्म-बोध कराने वाले हैं,
- आत्म-शुद्धि का मार्ग बताने वाले हैं,
- और भव-सागर (जन्म-मरण के चक्र) को नष्ट करने का पथ दिखाते हैं।
भाव यह है कि आत्म-शुद्धि, सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चरित्र का मार्ग सिर्फ ऐसे सिद्ध पुरुषों के उपदेश से मिलता है – इसलिए हम उनकी वंदना करते हैं।
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5. “मंगल जाप – जैन भजन” का भाव
एक और सरल भजन – “मंगल जाप” – जिसमें पंक्तियाँ आती हैं:
अंश: देह-विनाशी, मैं अविनाशी, अजर अमर पद मेरा रे ॥
सरल अर्थ:
- यह शरीर नश्वर है, नाश होने वाला है,
- पर मैं (आत्मा) अविनाशी, अजर-अमर स्वरूप हूँ।
यह भजन हमें याद दिलाता है कि
- हम वास्तव में शरीर नहीं, चेतन आत्मा हैं,
- असली मंगल तभी है जब हम कषायों को कम कर के आत्मा के शुद्ध स्वरूप की ओर बढ़ें।
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सार:
- जैन स्तवन का मुख्य उद्देश्य: तीर्थंकरों और सिद्धों के गुणों का स्मरण, आत्म-शुद्धि की प्रेरणा और सम्यक मार्ग की स्थिरता।
- सही जैन दृष्टि से स्तवन में भोग-विलास, सांसारिक सिद्धियाँ या दूसरों को हानि पहुँचाने वाली कामनाएँ नहीं माँगी जातीं।
- Digambar और Shwetambar – दोनों परंपराओं में भाषा/धुन अलग हो सकती है, पर मूल भाव यही है: गुणों की भक्ति, आत्मा का उत्थान, और मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर होना।
अगर आप किसी एक खास स्तवन (जैसे कोई विशिष्ट हिंदी/गुजराती भजन) का पूरा अर्थ पंक्ति-दर-पंक्ति चाहते हों, तो उसका नाम लिखकर कहें – मैं उसी का शुद्ध, सरल अर्थ बता सकता हूँ।