जैन पंच महाव्रत पाचखान
जैन धर्म में “पंच महाव्रत” और उनका “पाचखान (पचक्खाण / प्रतिज्ञा)” साधु‑साध्वी के लिए मुख्य आचार है। आपने जो लिखा है, उसे दो भाग में समझते हैं:
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१. जैन पंच महाव्रत कौन‑कौन से हैं?
पंच महाव्रत (महान व्रत) पाँच हैं:
- अहिंसा महाव्रत
- किसी भी जीव (सूक्ष्म से स्थूल तक) की - मन से, वचन से, काया से - स्वयं, दूसरों से करा कर, या अनुमोदन करके हिंसा न करना।
- सत्य महाव्रत
- असत्य, धोखा, कपट, चुगली, कठोर वचन आदि न बोलना। - ऐसा ही वचन बोलना जिससे किसी जीव की हिंसा न हो और कल्याण हो।
- अस्तेय (अचौर्य) महाव्रत
- जो वस्तु न दी गई हो, न मिले, न अपनी हो, उसे किसी भी तरह से न लेना। - चोरी, हेर‑फेर, बेइमानी, तौल‑माप में गड़बड़ी आदि सब छोड़ना।
- ब्रह्मचर्य महाव्रत
- इन्द्रिय‑भोग, काम‑विकार, किसी भी प्रकार का दैहिक‑संसर्ग (काया का स्पर्श) आदि का पूर्ण त्याग। - मन, वचन, काया से पवित्रता रखना।
- अपरिग्रह महाव्रत
- धन, वस्तुएँ, संबंध, प्रतिष्ठा आदि में ममता और आसक्ति न रखना। - बाह्य (घर, जमीन, धन…) और आभ्यंतर (राग‑द्वेष, मान, लोभ…) परिग्रह का त्याग।
परम्परा भेद (संकेत मात्र):
- दिगम्बर और श्वेताम्बर – दोनों में पंच महाव्रत के नाम व मूल भाव समान हैं।
- व्यावहारिक आचार (जैसे कितनी वस्तु, कैसा व्यवहार आदि) में थोड़े भेद की चर्चा आती है, पर व्रतों का तत्त्व और सार एक ही है – संपूर्ण अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह।
इन पर सरल लेख आप यहाँ भी पढ़ सकते हैं
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२. “पाचखान / पचक्खाण” क्या है?
पचक्खाण = प्रतिज्ञा / अड्ढाणा
- अपने ऊपर स्वयं लिया हुआ नियम –
- साधु‑साध्वी पंच महाव्रत का पचक्खाण दीक्षा के समय गुरु‑प्रेरित करते हैं।
- श्रावक‑श्राविका भी
ध्यान रहे – वास्तविक महाव्रत‑पचक्खाण सदा आचार्य / गुरु से ही कराया जाता है। नीचे केवल समझने के लिए एक सरल नमूना भाषा दी जा रही है; इसे औपचारिक दीक्षा‑पचक्खाण न मानें।
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३. पंच महाव्रत का बेहद सरल “पाचखान” (केवल समझ के लिए)
मान लीजिए कोई मुनि‑दिक्षा में पंच महाव्रत ले रहा है; भाव इस प्रकार होते हैं (अर्थानुसार, सरल हिंदी‑प्राकृत मिश्रित भाषा में):
- अहिंसा महाव्रत पचक्खाण
> हे अरिहन्त परमात्मा! > आज से मैं मन‑वचन‑काया से > स्वयं, करवाकर, अनुमोदन कर > किसी भी प्रकार की हिंसा नहीं करूँगा, > हिंसा‑रूप पाप से सदा विरत रहूँगा।
- सत्य महाव्रत पचक्खाण
> आज से मैं असत्य, झूठ, कपट, अपशब्द, चुगली, निंदा > आदि वचनों को छोड़ता हूँ। > मैं वही वचन बोलूँगा जो सत्य, हितकारी और अहिंसा‑रूप हो।
- अस्तेय महाव्रत पचक्खाण
> आज से मैं न दिया हुआ, न मिला हुआ, > दूसरों का धन‑पदार्थ किसी भी प्रकार से > मन, वचन, काया से न लूँगा, न दिलवाऊँगा, > चोरी‑रूप पाप का पूर्ण त्याग करूँगा।
- ब्रह्मचर्य महाव्रत पचक्खाण
> आज से मैं काम‑विकार, इन्द्रिय‑भोग, > स्त्री‑पुरुष‑संसर्ग आदि सबका त्याग करता हूँ। > मन‑वचन‑काया से न काम‑चिंतन करूँगा, > न उसकी प्रेरणा दूँगा, > सदैव निर्मल ब्रह्मचर्य का पालन करूँगा।
- अपरिग्रह महाव्रत पचक्खाण
> आज से मैं बाह्य‑परिग्रह (धन‑संपत्ति, वस्तु आदि) > तथा आभ्यंतर‑परिग्रह (राग, द्वेष, मान, लोभ आदि) > से विरक्त रहने की प्रतिज्ञा करता हूँ। > आवश्यक से अधिक संग्रह नहीं करूँगा, > आसक्ति‑ममता का त्याग करूँगा।
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श्रावक के लिए क्या ध्यान रखें?
- गृहस्थ के लिए अनुव्रत होते हैं, पूरे महाव्रत नहीं।
- श्रावक‑श्राविका अपने स्तर के अनुसार
- अगर आप व्यवहार में पचक्खाण लेना चाहते हैं,
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अगर आपको चाहिये तो अगली बार मैं सिर्फ श्रावक के लिए
- पाँच अनुव्रत
- और उनका छोटा‑सा पचक्खाण