सिद्ध भक्ति (प्राकृत)
प्राकृत सिद्ध भक्ति (कुन्दकुन्दाचार्य प्रणीत) – मूल पाठ
> श्री सिद्धभक्ति > अथ पौर्वाह्निक (अपराह्निक) आचार्य वन्दना-क्रियायां पूर्वाचार्यानुक्रमेण, > सकल‑कर्म‑क्षयार्थं, भाव‑पूजा‑वन्दना‑स्तव‑समेतं > श्री सिद्धभक्ति कायोत्सर्गं करोम्यहम्। > > १\. सम्मत्त‑णाण‑दंसण‑वीरिय‑सुहुमं तहेव अवगहणं। > अगुरु‑लघु‑मव्वावाहं, अट्ठगुणा होंति सिद्धाणं ॥ १ ॥ > > २\. तव‑सिद्धे णय‑सिद्धे, संजम‑सिद्धे चरित्त‑सिद्धे य। > णाणम्मि दंसणम्मि य, सिद्धे सिरसा णमस्सामि ॥ २ ॥ > > ३\. इच्छामि भंते ! सिद्धभत्ति काउस्सग्गो कओ तस्सालोचेउं > सम्मणाण‑सम्मदंसण‑सम्मचारित्त‑जुत्ताणं, > अट्ठविह‑कम्म‑विप्पमुक्काणं, अट्ठगुण‑संपण्णाणं, > उड्ढ‑लोय‑मत्थयम्मि पयट्ठियाणं, तव‑सिद्धाणं, णय‑सिद्धाणं, > संजम‑सिद्धाणं, चरित्त‑सिद्धाणं, अतीत‑आणाग‑वट्टमाण‑काल‑त्तय‑सिद्धाणं, > सव्व‑सिद्धाणं णिच्च‑कालं अंचेमि, पूजेमि, वंदामि, णमस्सामि, > दुक्ख‑क्खओ, कम्म‑क्खओ, बोहिलाओ, सुगइ‑गमणं, समाहि‑मरणं, > जिण‑गुण‑सम्पत्ति होउ मज्झं।
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बहुत सरल अर्थ (संक्षेप में)
- पहली गाँथा
- सम्मत्त‑णाण‑दंसण‑वीरिय‑सुहुमं… सिद्ध भगवान् के पास - सम्यक् ज्ञान, - सम्यक् दर्शन, - सम्यक् वीर्य (शक्ति), - बहुत सूक्ष्म (शुद्ध) शरीर, - अगुरु‑लघु गुण (ना भारी, ना हल्का – कर्म से बिल्कुल रहित), - और सम्यक्त्व आदि आठ गुण हैं।
- दूसरी गाँथा
- हम उन सिद्धों को नमस्कार करते हैं – - जो तप से सिद्ध हुए, - नय (सही दृष्टि‑कोण) से सिद्ध हुए, - संयम से सिद्ध हुए, - और शुद्ध चारित्र से सिद्ध हुए। - ज्ञान और दर्शन में सिद्ध उन परमात्माओं को हम सिर झुका कर नमस्कार करते हैं।
- तीसरा गद्य भाग
- “हे भगवन्! मैंने सिद्ध‑भक्ति का कायोत्सर्ग किया है, उसकी आलोचना (पाप‑क्षमा) करना चाहता हूँ।” - फिर सिद्धों का वर्णन करता है: - सम्यक् ज्ञान‑दर्शन‑चारित्र से युक्त, - आठों कर्मों से छूटे हुए, - आठ गुणों से सम्पन्न, - ऊर्ध्वलोक (सिद्धशिला) के शिरों पर स्थित, - तप‑सिद्ध, नय‑सिद्ध, संयम‑सिद्ध, चरित्र‑सिद्ध, - तीनों काल (भूत, भविष्य, वर्तमान) के सभी सिद्ध, - उन सभी सिद्धों को मैं सदा आराधना, पूजा, वन्दन, नमस्कार करता हूँ। - “उनकी कृपा से मेरा दुःख और कर्म क्षय हो, मैं सही बोध पाऊँ, उत्तम गति, सम्यक् समाधि‑मरण और जिन‑गुणों की प्राप्ति मुझे हो।”
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परम्परा का उल्लेख
- यह प्राकृत सिद्ध भक्ति प्रायः दिगम्बर परम्परा में
- श्वेताम्बर परम्परा में भी सिद्ध भगवन् की स्तुति हैं, परन्तु शब्द और रचना भिन्न हो सकती है;