Nageshwar paraswanath story in hindi
नागेश्वर पार्श्वनाथ की कथा (सरल हिंदी में)
बहुत समय पहले उत्तर भारत में अहिच्छत्रपुर नाम का एक प्राचीन नगर था। वहाँ भगवान पार्श्वनाथ की एक अद्भुत प्रतिमा स्थापित थी। यह प्रतिमा बहुत ही चमत्कारी और पूज्य मानी जाती थी।
1. स्वर्ण प्रतिमा और लोभियों का षड्यन्त्र
मान्यता है कि प्रारम्भ में यह प्रतिमा स्वर्ण (सोने) की थी। समय के साथ लोगों को पता चला कि मंदिर में अत्यन्त मूल्यवान स्वर्ण प्रतिमा है। कुछ लोभी लोगों ने ठान लिया कि या तो इस प्रतिमा को चुरा लेंगे या तोड़कर उसका सोना ले जाएंगे।
उस समय एक महान तपस्वी जैन आचार्य वहाँ विराजमान थे। उन्हें अपनी देव भावना और तपबल से यह ज्ञात हो गया कि प्रतिमा पर संकट आने वाला है।
2. आचार्य द्वारा धार्णेन्द्र को बुलाना
आचार्य ने अपने तपबल से धार्णेन्द्र देव (जो भगवान पार्श्वनाथ के बहुत ही समर्पित शासनीय देव हैं) को स्मरण किया और कहा:
> “हे देव! यह भगवान पार्श्वनाथ की प्रतिमा लोभियों के कारण संकट में है, इसे सुरक्षित करना आवश्यक है।”
धार्णेन्द्र देव ने आचार्य की आज्ञा मानी और चमत्कार से उस स्वर्ण प्रतिमा को पत्थर में बदल दिया, ताकि कोई भी लोभी व्यक्ति उसे तोड़कर सोना न ले सके। इस प्रकार प्रतिमा का रूप तो बदल गया, लेकिन उसकी पवित्रता, चमत्कार और तेज वही के वही रहे।
3. प्रतिमा का नए स्थान पर आगमन
समय बीतने के बाद यह प्रतिमा वहाँ से स्थानान्तरित होकर आगे चलकर परसनगर / वीरमपुर (विभिन्न परम्पराओं में नामों का थोड़ा अन्तर मिलता है) नाम के स्थान पर लाई गई।
वहाँ के राजा अजीतसेन (अथवा अजितसेन) बहुत धर्मात्मा थे, परंतु वे निर्औलाद (बिना संतान के) थे। उन्होंने इस प्रतिमा के लिए:
- अत्यन्त सुंदर जैन मंदिर का निर्माण करवाया
- नियमित पूजा, आरती, अभिषेक और दान आदि करना शुरू किया
- अत्यन्त श्रद्धाभाव से भगवान पार्श्वनाथ की भक्ति की
भगवान की कृपा से कुछ समय बाद राजा को संतान प्राप्त हुई। इससे राजा की श्रद्धा और बढ़ गई, और यह स्थान जैनों के लिए अतिशय क्षेत्र के रूप में प्रसिद्ध होने लगा।
4. “नागेश्वर पार्श्वनाथ” नाम कैसे पड़ा?
भगवान पार्श्वनाथ के ऊपर जो फण फैलाए हुए सर्प (नाग) की सुन्दर मूर्ति है, और धार्णेन्द्र देव का सर्प रूप से विशेष सम्बन्ध है, इस कारण:
- इस प्रतिमा को “नागों से सम्बंधित पार्श्वनाथ” माना गया
- आगे चलकर यह क्षेत्र “नागेश्वर” नाम से प्रसिद्ध हो गया
- और भगवान का विग्रह “श्री नागेश्वर पार्श्वनाथ भगवान” के नाम से जानने लगा
कुछ परम्पराओं में यह भी मान्यता है कि प्रतिमा के पीछे या आसपास नाग देवता का वास है, इस कारण लोग विशेषतः सर्प भय, कालसर्प, अथवा अन्य भय–क्लेश से मुक्ति के लिए यहाँ दर्शन–पूजन करने आते हैं।
5. बाद के समय में पुनः प्रतिष्ठा और संरक्षण
कालान्तर में प्रतिमा जिस गाँव/स्थान पर रही, वहाँ के कुछ गैर–जैन लोगों ने इसे सिर्फ “नाग बाबा” के रूप में मानना शुरू कर दिया। जैन आचार्यों और समाज को जब पता चला कि यह वास्तव में प्राचीन जैन तीर्थंकर पार्श्वनाथ की प्रतिमा है, तो:
- जैन आचार्यों ने बहुत प्रयास, समझाइश और कानूनी प्रक्रिया द्वारा
- इस प्रतिमा को पुनः जैन समाज के अधिकार में दिलवाया
- फिर जैन विधि से पुनः प्रतिष्ठा, १८ अभिषेक, और अन्य धार्मिक विधान कराए गए
आज यह प्रतिमा श्वेताम्बर परम्परा में विशेष रूप से पूजित है, और “नागेश्वर पार्श्वनाथ” 108 प्रमुख पार्श्वनाथ प्रतिमाओं में गिना जाता है (श्वेताम्बर परम्परा में विग्रह प्रायः क्षेत्र/स्थान के नाम से ही प्रसिद्ध होते हैं)।
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आध्यात्मिक संदेश (क्या सीख मिलती है?)
नागेश्वर पार्श्वनाथ की इस कथा से हमें सरल बातें समझ आती हैं:
- लोभ सबसे बड़ा शत्रु है – सोने की प्रतिमा पर लोभ ने धर्मस्थान को ही संकट में डाल दिया।
- सच्ची भक्ति और तप की रक्षा अवश्य होती है – आचार्य के तपबल एवं धार्णेन्द्र की भक्ति द्वारा प्रतिमा सुरक्षित रही।
- तीर्थंकर की भक्ति से संसारिक दुःख भी हल्के होते हैं – राजा अजीतसेन को संतान प्राप्ति जैसे लौकिक फल भी मिले, पर असली लाभ तो श्रद्धा, संयम और वैराग्य की प्रेरणा है।
- तीर्थ और प्रतिमा की पहचान बनाये रखना ज़रूरी है – ताकि आगे की पीढ़ियाँ जान सकें कि यह कोई साधारण “नाग बाबा” नहीं, बल्कि केवलज्ञानी तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ का विग्रह है।
इस प्रकार श्री नागेश्वर पार्श्वनाथ भगवान की कथा हमें अहिंसा, अपरिग्रह (अधिक लोभ न करना), और सच्ची भक्ति की राह पर चलने की प्रेरणा देती है।