Goutam swami ka sampuran जीवन
गौतम स्वामी का संपूर्ण जीवन (संक्षेप व सरल रूप में)
१. जन्म व प्रारम्भिक जीवन
- गौतम स्वामी का मूल नाम – इंद्रभूति गौतम
- जन्म – मगध देश में “गोबरग्राम” (या इसी नाम के आसपास का गाँव) में एक ब्राह्मण कुल में
- पिता – वसुभूति, माता – पृथ्वी
- वे वेद‑शास्त्रों के बहुत बड़े पंडित, विद्वान् गुरु व हवन‑यज्ञ करने वाले आचार्य थे।
- उनके दो छोटे भाई भी थे – अग्निभूति और वायुभूति – जो आगे चलकर भगवान महावीर के ही गणधर बने।
२. महावीर स्वामी से भेंट कैसे हुई?
- उस समय इंद्रभूति गौतम के बहुत से शिष्य थे, बड़ा नाम और मान‑सम्मान था, थोड़ा अहंकार भी था।
- जब भगवान महावीर ने छः द्रव्य, सात तत्त्व आदि का गहरा विशुद्ध ज्ञान देना शुरू किया, तो इंद्रों ने (देवों ने) ऐसी दिव्य व्यवस्था की कि गौतम स्वामी को यह पता चले कि कोई महाज्ञानी तपस्वी इन विषयों का अद्वितीय निरूपण कर रहा है।
- वे यह सोचकर गए कि “मैं जाऊँगा और तर्क से उसे हरा दूँगा।”
- पर जैसे ही भगवान महावीर के समवसरण में पहुँचे, मानस्तंभ (अहंकार गलाने वाला स्तंभ) व प्रभु की विशुद्ध वाणी‑प्रभाव से उनका अभिमान पिघलता गया।
- प्रभु ने बिना पूछे ही उनके मन में उठ रहे प्रश्नों का समाधान दे दिया – इससे उन्हें निश्चित हो गया कि “ये तो सर्वज्ञ (केवलज्ञानी) तीरथंकर हैं।”
- वहीं उनके मिथ्यात्व का नाश हुआ, उन्हें सम्यग्दर्शन हुआ और उन्होंने प्रभु से दीक्षा लेकर गौतम गणधर के रूप में जीवन आरम्भ किया।
३. गणधर पद व शिष्य जीवन
- भगवान महावीर के ११ गणधर (मुख्य शिष्य) थे, उनमें गौतम स्वामी सबसे वरिष्ठ प्रथम गणधर थे।
- महावीर स्वामी की बहुत‑सी आगम वाणी (आगम‑सूत्र) गौतम स्वामी के माध्यम से परंपरा में आई, इसलिए उन्हें शास्त्र‑परंपरा का मुख्य आधार भी माना जाता है।
- वे अत्यंत तेजस्वी, विनम्र, अनुशासित साधु थे।
- उनके अनेक शिष्य थे; विशेषता यह कही जाती है कि
४. गौतम स्वामी और राग (भगवान से लगाव)
- गौतम स्वामी को अपने गुरु भगवान महावीर से बहुत अधिक स्नेह था – इतना कि वह राग‑रूप बंधन बन गया।
- वे सदा प्रभु के पास रहना चाहते, प्रभु की सेवा‑उपस्थिति छोड़ना नहीं पसंद करते थे।
- जैन आगमों में स्पष्ट रूप से समझाया गया है कि
- इसी कारण, अनेक गुणों के होते हुए भी, वे केवलज्ञान में देर से पहुँचे – यह हमारे लिए बहुत बड़ा आत्मचिंतन का विषय है।
५. दीपावली व गौतम स्वामी का केवलज्ञान
- भगवान महावीर का निर्वाण कार्तिक अमावस्या (दीपावली) की रात को हुआ।
- उससे ठीक पहले, प्रभु ने एक योजना के रूप में गौतम स्वामी को एक भक्त के घर प्रवचन देने के लिए दूसरे ग्राम भेज दिया, ताकि उनके बीच का राग‑बंध टूट सके।
- मार्ग में ही देववाणी द्वारा समाचार मिला कि
- यह सुनकर गौतम स्वामी बहुत दुःखी हुए –
- जैसे‑जैसे वे विचार करते गए, उन्हें अपने राग का बोध हुआ –
- इस आत्म‑जागृति व गुरु के पूर्ण वितराग भाव का गहन चिंतन करते‑करते उनके अज्ञान के आवरण टूट गए और
- इस प्रकार,
६. आगे की परंपरा
- केवलज्ञान के कुछ समय बाद गौतम स्वामी भी मोक्ष को गए (तीर्थंकरों की तरह ही सिद्ध पद प्राप्त किया)।
- उनके बाद सुदर्मा स्वामी प्रमुख आचार्य बने, फिर जम्बूस्वामी आदि से होती हुई आगमिक परंपरा आगे चली।
- श्वेताम्बर परंपरा में यह भी कहा जाता है कि गौतम स्वामी का केशी गणधर (जो पार्श्वनाथ भगवान के गणधर थे) से संवाद हुआ और वहाँ से चार्य परंपरा की कड़ी जुड़ी मानी जाती है;
- दिगम्बर परंपरा भी गौतम स्वामी को पहले गणधर के रूप में ही मानती है, पर आगम‑क्रम व परंपरा‑विवरण में दोनों संप्रदायों के कुछ भिन्न‑भिन्न मत हैं।
७. जैन परंपरा में गौतम स्वामी की विशेष मान्यता
- वे पंच परमेष्ठी में आने वाले आचार्य‑परंपरा व गणधर‑परंपरा के मुख्य पुरुषों में गिने जाते हैं (विशेषकर गणधर रूप में)।
- बहुत से जैन व्यापारी नया वर्ष या नया बही‑खाता शुरू करते समय गौतम स्वामी का नाम लिखते हैं – यह श्वेताम्बर समाज में शुभ‑सूचक परंपरा है।
- उनकी अत्यंत विनम्रता, गुरु‑भक्ति, सत्य‑अहिंसा‑संयम के पालन की कथाएँ जैन कथासाहित्य में बहुत बार सुनाई जाती हैं।
- “गौतम गीता” आदि कई ग्रंथ, कथाएँ व आराधनाएँ उनकी वाणी व जीवन‑आधारित हैं।
८. जीवन से मिलने वाली सीख (सार) गौतम स्वामी के जीवन से हमें मुख्यतः ये बातें सीखने को मिलती हैं –
- अहंकार का त्याग – बड़े से बड़ा विद्वान भी यदि नम्र हो जाए, तो उसे सम्यग्दर्शन मिल सकता है।
- सच्चा गुरु वही जो शिष्य को अपने समान या आगे बढ़ा दे – महावीर स्वामी ने अपने गणधरों को ऐसा ही बनाया।
- राग‑द्वेष से मुक्ति –
- भगवान से भी राग (चिपकाव) हमें केवलज्ञान से रोक सकता है; - इसलिए वितरागता ही अंतिम मंजिल का द्वार है।
- गुरु के प्रति अखण्ड श्रद्धा –
- जब गौतम स्वामी को अपनी चूक का बोध हुआ, तो तुरंत भाव बदल गए, - “मेरी सोच गलत थी, प्रभु तो सदा ही सही हैं” – यही साधु‑धर्म की सच्ची पहचान है।
गौतम स्वामी पर अक्सर जैन समाज में प्रश्न‑उत्तर और लेख प्रकाशित होते रहते हैं। आप आसान भाषा में एक छोटा लेख यहाँ भी पढ़ सकते हैं