Dhup pooja shlok
धूप पूजा के लिए हर जगह एक ही निश्चित श्लोक नहीं है। अलग–अलग पूजा‑पुस्तक, संघ और परंपरा (दिगंबर / श्वेतांबर, और श्वेतांबर के अलग–अलग गच्छ) में धूप‑पूजा के मंत्र थोड़े भिन्न मिलते हैं, इसलिए किसी एक श्लोक को “सभी का” मानक जैन श्लोक कहकर देना सही नहीं होगा।
लेकिन इसका भावार्थ (अर्थ) हर जगह लगभग यही होता है:
- मैं यह सुगंधित धूप अर्हत भगवान के चरणों में अर्पण कर रहा/रही हूँ
- जैसे धूप स्वयं जलकर सुगंध फैलाती है, वैसे ही मैं भी अपने राग‑द्वेष, क्रोध, मान, माया, लोभ आदि कषायों को “जला कर” नष्ट करूँ
- और मेरी आत्मा के शुद्ध गुण (सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चरित्र) सब ओर फैलें
धूप‑पूजा अष्टप्रकारी‑पूजा (जल, चंदन, अक्षत, पुष्प, नैवेद्य, दीपक, धूप, फल) का ही एक अंग है। धूप का प्रतीक अर्थ जैन धर्म में यह बताया जाता है:
- धूप स्वयं जलती है, पर दूसरों को सुगंध देती है – वैसे ही मुनि‑जीवन / तपश्चर्या
- जो जीव भोग‑वृत्तियों (भोग की आसक्ति) को “जला” देता है, उसकी आत्मा के गुणों की सुवास सब ओर फैलती है
आप क्या करें?
यदि आपको विशेष रूप से श्लोक का सही पाठ चाहिए, तो सबसे अच्छा है कि आप:
- अपने मंदिर / गृह‑पूजा में जो आधिकारिक पूजा‑पुस्तक चलती है, उसी में दिया हुआ
“धूप पूजन” या “धूपम् निर्वपामीति” वाला श्लोक पढ़ें।
- या अपने पूज्य साधु‑साध्वी / पंडित‑जी / पाटशाला‑शिक्षक से वही श्लोक सही उच्चारण सहित लिखवा लें।
इससे आप अपनी परंपरा के अनुसार शुद्ध और प्रमाणित श्लोक ही प्रयोग करेंगे, जो जैन धर्म की मर्यादा के लिए सबसे उचित है।