Panchvrata ke lakshan
जैन धर्म में “पंच-व्रत” के लक्षण (अर्थ/पहचान) इस प्रकार हैं:
- अहिंसा-व्रत (अहिंसा)
- किसी भी जीव को मन, वचन, काया से न मारना, न दुख देना। - क्रोध, कठोर शब्द, हिंसक विचार – ये भी अहिंसा के विरुद्ध हैं।
- सत्य-व्रत (सत्य)
- सही, हितकर और शान्तिपूर्ण बात कहना। - झूठ, चुगली, कड़वे/चोट पहुँचाने वाले शब्द से बचना।
- अचौर्य / अस्तेय-व्रत (अचौर्य)
- चोरी न करना – जो वस्तु, समय, विचार या धन आपका नहीं है, उसे बिना उचित अधिकार या बिना अनुमति न लेना। - धोखा, मिलावट, तौल में कमी – ये भी चोरी के ही रूप हैं।
- ब्रह्मचर्य-व्रत (ब्रह्मचर्य)
- इन्द्रियों पर संयम रखना। - साधु के लिए – पूर्ण देह, मन, वचन से ब्रह्मचर्य। - श्रावक के लिए – पत्नी/पति के प्रति निष्ठा व मर्यादित, शुद्ध जीवन।
- अपरिग्रह-व्रत (अपरिग्रह)
- अति-संग्रह और आसक्ति से बचना। - जितना आवश्यक हो उतना ही रखना, अनावश्यक वस्तु, पैसा, मान–प्रतिष्ठा की लिप्सा न रखना, मन से भी ममता कम करना।
नोट:
- साधु-साध्वी इन्हीं पाँचों को महाव्रत रूप से बहुत कठोरता से निभाते हैं।
- श्रावक-श्राविका इन्हें अनुव्रत रूप में अपनी गृहस्थ-परिस्थिति के अनुसार सीमित रूप से निभाते हैं।