परमात्मा की आगी कब उतरना चाहिए
जैन परंपरा के अनुसार “आगी उतारना” (दीपक/कपूर की आरती करना) पूजा‑भक्ति का भाग है, कोई ज्योतिषीय या “मुहूर्त‑आधारित” काम नहीं। इसलिए शास्त्रों में इसकी कोई पक्की “तारीख/घड़ी” तय नहीं की गई, पर व्यवहार में कुछ सही समय मानें जाते हैं:
1. मंदिर में
- प्रातःकाल: अभिषेक–पूजन, नित्य पूजा, चैत्यवंदन आदि के बाद अंत में परमात्मा की आरती/आगी उतारी जाती है।
- सायंकाल: संध्याकालीन पूजा या प्रवचन के बाद दीवान‑आरती/मंगल दीवा किया जाता है।
- कुल मिलाकर, पूजा या चैत्यवंदन के “समापन पर” आगी उतारना उचित माना जाता है।
2. घर पर
- जब भी आप शांत मन से जिन प्रतिमा/चित्र के आगे
- इसे दैनिक नियम (सुबह या शाम) के रूप में रखना अच्छा है, न कि मन आया तब, खाते‑पीते या भागदौड़ में।
3. किन समयों से बचें (परंपरागत दृष्टि से)
- अत्यधिक क्रोध, दुख, या अविवेक की अवस्था में सिर्फ दिखावे के लिए आरती करना।
- अशुद्धि, असंयम, हंसी‑मजाक के बीच बैठकर बस रस्मनुमा आगी उतारना।
- सिर्फ लोकरीति, फल‑कामना या दिखावे के लिए, बिना भाव के।
4. भाव क्या हों?
- “मैं सिद्ध परमात्मा के गुणों का स्मरण कर रहा हूँ, उनके समान बनने की प्रेरणा ले रहा हूँ।”
- आरती/आगी उपचार है, साधन नहीं – मूल साधन तो सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान और सम्यक चारित्र ही हैं।
संक्षेप: परमात्मा की आगी कभी भी उतार सकते हैं, जब मन शांत, शुद्ध और भक्तिभाव से भरा हो; व्यावहारिक रूप से यह पूजा/चैत्यवंदन के अंत में, प्रातः या सायंकाल करना सबसे उचित और पारंपरिक माना जाता है।