Why do we say jai jai nanda jaibjai badda
“Jai Jai Nanda, Jai Jai Bhadra / Badda”
यह वाक्य कोई अलग से मंत्र नहीं है, बल्कि श्वेतांबर परंपरा में बोला जाने वाला स्लोगन / घोष है।
संक्षेप में कारण:
- आगम-वर्णित प्रसंग से जुड़ा है
जैन ग्रंथों में वर्णन आता है कि जब तीर्थंकर भगवान का दीक्षा‑काल निकट होता है, तो देवगण आकर प्रभु की स्तुति करते हैं और “जय जय नंदा, जय जय भद्दा” कहकर आनंद व्यक्त करते हैं। उसी देव‑स्तुति से यह घोष प्रचलित हुआ है।
- आज कहाँ बोला जाता है
- साधु‑साध्वी की डोल यात्रा / अंतिम यात्रा में - गुरुभक्ति, दीक्षा‑उत्सव, बड़े धार्मिक कार्यक्रमों में श्रावक‑श्राविकाएँ यह घोष करते हैं, ताकि माहौल शोक का नहीं, वैराग्य और आनंद का रहे – जैसे देवगण ने तीर्थंकर की दीक्षा पर आनंद से स्तुति की थी।
- अर्थ (सरल समझ)
- “जय” = विजय, स्तुति, महिमा हो - “नंदा” और “भद्रा” = आनंद देने वाला, मंगलकारी / शुभ – प्रभु के लिए अत्यंत शुभ संबोधन इसलिए भावार्थ ऐसा समझिए: > “हे परम शुभ, परम आनंदमय प्रभु! आपकी बार‑बार जय हो, महिमा हो।”
- परंपरा का भाव
इसको बोलने से - प्रभु की महिमा की स्मृति रहती है - मन में वैराग्य, आनंद और गुरुभक्ति का संयोग होता है - मृत्यु या विरह के प्रसंग में भी “यह आत्मा आगे शुभ मार्ग पर बढ़े” – ऐसा मंगल भाव जागृत होता है।
तो हम “Jai Jai Nanda, Jai Jai Bhadra” इसलिए कहते हैं कि देवों की प्राचीन स्तुति की याद करते हुए, उसी तरह आनंद‑पूर्वक, शुभ‑भाव से प्रभु और संतों की महिमा गा सकें।