Syaadvaad ka udaaharan
स्याद्वाद समझने के लिए कुछ आसान उदाहरण:
1) घड़ा (मिट्टी का बरतन) का उदाहरण एक मिट्टी का घड़ा सामने रखा है। अब उसी घड़े के बारे में अलग–अलग स्याद्वाद वाले वाक्य:
- स्याद् अस्ति – इस दृष्टि से यह है
- जब वह मेरे सामने रखा है, तो कहा: “घड़ा है।”
- स्याद् नास्ति – इस दृष्टि से यह नहीं है
- उसी घड़े के टुकड़े कर दिए जाएँ, तब: “यह घड़ा नहीं है” (अब वो सिर्फ मिट्टी/टुकड़े हैं)।
- स्याद् अस्ति–नास्ति – इस दृष्टि से है भी और नहीं भी
- पदार्थ की द्रव्य दृष्टि से (मिट्टी के रूप में) वो है, - पर घड़े के विशेष रूप (आकृति) से देखने पर टूटा होने से नहीं है। ⇒ “मिट्टी है, पर घड़ा नहीं है।”
- स्याद् अवक्तव्यः – इस दृष्टि से कहना कठिन है
- बहुत सूक्ष्म, बदलती हुई अवस्था में हो, कि न साफ़ “है” कह सकें, न “नहीं है” – तो वह अवक्तव्य कहलाती है।
इसी तरह आगे की तीन भंगियाँ (संयुक्त रूप – अस्ति–अवक्तव्यः, नास्ति–अवक्तव्यः, अस्ति–नास्ति–अवक्तव्यः) भी अलग–अलग दृष्टि, समय और अवस्था को जोड़कर बताती हैं।
2) एक ही इंसान का उदाहरण कोई व्यक्ति “राहुल” है:
- अपने माता–पिता की दृष्टि से: “ये बेटा है।” – स्याद् अस्ति (बेटे के रूप में)
- अपनी कंपनी की दृष्टि से: “ये मैनेजर है।” – स्याद् अस्ति (मैनेजर के रूप में)
- सड़क पर एक अजनबी की दृष्टि से: “ये कोई अनजान है।” – स्याद् नास्ति (अपने जाने–पहचाने व्यक्ति के रूप में नहीं है)
एक ही व्यक्ति, पर अलग–अलग नयों / दृष्टिकोण से उसका स्वरूप बदलता दिखता है। यही सापेक्ष कथन – स्याद्वाद – कहलाता है।
3) कप–चाय का छोटा उदाहरण मेज पर रखा कप:
- “यह कप है” – आकार की दृष्टि से सही।
- “यह मिट्टी है” – द्रव्य (पदार्थ) की दृष्टि से सही।
- “यह कप नहीं है” – जब पिघलाकर फिर से कच्ची मिट्टी बना दी जाए, तब सही।
सभी कथन सापेक्ष हैं, अपने–अपने दृष्टिकोण से सही हैं – यही स्याद्वाद की भावना है: एक ही वस्तु को अनेक दृष्टियों से, सात प्रकार की कथन–पद्धति से देखना, और एक–तरफ़ा जिद से बचना।
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