जीवघणा का शब्दार्थ क्या है
“जीवघणा” (या “जीव-घणा”) कोई प्रसिद्ध जैन सूत्र/स्तोत्र का निश्चित शब्द नहीं है, बल्कि बोलचाल या भजन में आने वाला पद है, इसलिए उसका अर्थ प्रसंग (context) के अनुसार थोड़ा बदल सकता है। सामान्यतः इसके दो मुख्य अर्थ लिए जाते हैं:
- बहुत जीव / असंख्य जीव
- “जीव” = प्राणी, आत्माएँ - “घणा” (गुजराती/राजस्थानी बोली) = बहुत, अधिक ⇒ “जीवघणा” = जहाँ बहुत सारे जीव हों / असंख्य जीव
- जीवों से जुड़ा हुआ, जीवों से भरा हुआ
- जैसे: यह संसार “जीवघणो” है = इसमें बहुत प्रकार के जीव हैं।
अगर आपने यह शब्द किसी खास जैन भजन, प्रवचन या गाथा में सुना है, तो उसी पंक्ति के अनुसार उसका अर्थ थोड़ा विशेष रूप लेगा। आप वह पूरी पंक्ति लिख दें तो मैं उसी के अनुसार सरल शब्दार्थ बता सकता हूँ।