हे महामुनि हाथी के भाव में खरगोश को बचाने कितना सहन किया अब महात्माओं के चरण स्पर्श से इतनी क्यों अनु अकाल आते हो
आपका प्रश्न जैन धर्म के दृष्टिकोण से बहुत गूढ़ है। जैन धर्म में अहिंसा, सहनशीलता और करुणा को अत्यंत महत्व दिया गया है। हाथी के भाव में खरगोश को बचाने की कथा संभवतः किसी पूर्व जन्म की आत्मा के तप, सहिष्णुता और करुणा का उदाहरण हो सकती है। जब कोई जीव अपने जीवन में दूसरों की रक्षा करता है, विशेषकर निर्बल जीवों की, तो वह पुण्य का अर्जन करता है और उसके कर्मों का बंधन भी उस भावना के अनुरूप होता है।
महात्माओं के चरण स्पर्श से अनु अकाल (कष्ट, विपत्ति) आने का जो सवाल है, वह इस तथ्य को दर्शाता है कि जैन धर्म में हर जीव अपने-अपने कर्मों का फल भोगता है। महात्मा या साधु स्वयं अपने संचित कर्मों के नाश के लिए तप और साधना करते हैं। उनके संपर्क में आने से, यदि किसी व्यक्ति के जीवन में कष्ट आते हैं, तो वह उनके अपने पूर्व जन्म या वर्तमान जन्म के कर्मों का परिणाम होता है, न कि महात्माओं के कारण। महात्मा किसी को कष्ट नहीं देते; बल्कि उनके सत्संग, उपदेश और आशीर्वाद से आत्मा का कल्याण होता है।
जैन ग्रंथों के अनुसार, "अप्पा कत्तā अप्पा तणो" — अर्थात्, आत्मा स्वयं अपने कर्मों की कर्ता है। अतः महात्माओं के चरण स्पर्श या सत्संग से अनु अकाल आना, यह केवल हमारे अपने कर्मों के उदय के कारण है। महात्माओं के संपर्क में आने से हमें अपने कर्मों का क्षय करने का अवसर मिलता है और आत्मा को शुद्धि की ओर ले जाने का मार्ग मिलता है।
संक्षेप में: हाथी के भाव में खरगोश को बचाना करुणा और अहिंसा का उदाहरण है। महात्माओं के चरण स्पर्श या सत्संग से किसी प्रकार की विपत्ति आना उनके कारण नहीं, बल्कि स्वयं के कर्मों के कारण होता है। महात्मा तो केवल मोक्ष मार्ग का पथ प्रदर्शित करते हैं।