Mandir vidhi arth sahit
यहाँ सरल “मंदिर विधि – अर्थ सहित” दी जा रही है, जिसे सामान्यतः जैन (खासकर श्वेतांबर) मन्दिर में अपनाते हैं।
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1. घर से निकलते समय
- मन में भाव:
- क्या पढ़ें (संक्षेप में)
अर्थ: मैं अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और समस्त साधु–साध्वियों को नमस्कार करता/करती हूँ। इन पाँच परमेष्ठियों की वन्दना सब पापों का नाश करनेवाली और सबसे बड़ा मंगल है।
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2. मन्दिर के द्वार पर – पहला निस्सहि
द्वार पर पहुँचकर (अन्दर जाने से पहले) धीमे से बोलते हैं: “निस्सहायं करुṇं बलेण, णिस्सहि।” (श्वेतांबर परंपरा में अलग–अलग लघु रूप हैं, कहीं सिर्फ “निस्सहि” बोला जाता है।)
सरल अर्थ: “मैं बाहर की सारी सांसारिक चिंताओं को छोड़कर, अब केवल भगवान की शरण में जाता/जाती हूँ।”
- चप्पल/जूते बाहर निकालकर, मन में नम्रता का भाव रखकर भीतर प्रवेश करें।
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3. गर्भगृह की ओर – दूसरा निस्सहि
भगवान की मूर्ति के पास (गर्भगृह के दरवाजे के निकट) पहुँचकर फिर से “निस्सहि” कहा जाता है।
अर्थ: अब और भी सूक्ष्म रूप से, मन–वाणी–काया की चंचलता छोड़कर, केवल दर्शन–भक्ति पर ध्यान लगाना।
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4. भगवान के दर्शन
भगवान के सामने खड़े होकर या बैठकर शांत भाव से यह करें:
(क) प्रणाम
- दोनों हाथ जोड़कर, आँखें आधी बन्द/शांत रखकर, भगवान के गुणों पर ध्यान।
- मन में बोलें –
(ख) नवकार मंत्र
3, 9, 27, 108 बार – जितना समय और भाव हो, उतना जपें। उसी अर्थ के साथ, जैसा ऊपर बताया।
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5. मूल चैत्यवंदन (संक्षिप्त रूप)
यदि समय कम हो तो बहुत से श्रावक/श्राविका छोटा चैत्यवंदन करते हैं, जिसमें मुख्यतः:
- चत्तारी मंगलम् (Chattāri Maṅgalam)
“चत्तारी मंगलं, अरिहंत मंगलं, सिद्धा मंगलं, साहू मंगलं, केवलीपण्णत्तो धम्मो मंगलं॥”
अर्थ (बहुत सरल): चार चीजें मंगल हैं – - अरिहंत - सिद्ध - साधु - और केवलज्ञानियों द्वारा प्रतिपादित धर्म – यही सब से बड़ा कल्याणकारी मंगल है।
- लोगस्स (Logassa sutra) – यदि आता हो
इसमें चौबीस तीर्थंकरों की वन्दना होती है। भावार्थ: समस्त तीर्थंकरों के गुणों को स्मरण कर, उनके जैसा वीतराग, शांत और ज्ञानवान बनने की प्रार्थना।
- खमासमन (Khamāsaman sutra)
“खमासमणो विणयसम्पण्णो...” इत्यादि। अर्थ: मैं उन सभी साधु–साध्वियों को नमस्कार करता/करती हूँ जो क्षमाशील, विनयवान, शील से युक्त और जिनधर्म में स्थित हैं।
> पूरी विस्तृत “चैत्यवंदन विधि” (श्वेतांबर शैली) आप यहाँ पढ़ सकते हैं >
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6. पूजा/अभिषेक (यदि करें)
यदि मन्दिर में अभिषेक/पूजा की परम्परा है (अधिकतर श्वेतांबर), तो:
- जल–अभिषेक / स्नान
भगवान पर जल चढ़ाते समय – - भाव: “जैसे यह जल बाह्य मल धोता है, वैसे ही मेरे कर्म मल भी धुलें, और मेरा चित्त निर्मल बने।”
- चन्दन, अक्षत, पुष्प
- चन्दन: ठण्डक और शांति – “मेरा मन भी राग–द्वेष से ठण्डा और शांत हो।” - अक्षत (चावल): अखण्डता – “मेरी सद्गुणों की अखण्ड धारा बनी रहे।” - पुष्प: सौंदर्य और कोमलता – “मेरे भाव भी इतने ही कोमल, सुगंधित (सद्गुणों से भरे) हों।”
- दीपक (आरती)
- “अज्ञान का अँधेरा मिटाकर सम्यक्ज्ञान–प्रभा फैले।” - आरती के समय किसी जैन आरती/स्तवन का गान करते हैं।
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7. प्रदक्षिणा (परिक्रमा)
- भगवान या वेदी के चारों ओर दाएँ कंधे की ओर से घूमना।
- अर्थ:
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8. अंत में – क्षमायाचन और नमस्कार
अन्त में पुनः नमस्कार करके कहें:
- “micchāmi dukkadam” / “मिच्छामि दुक्कडं” (यदि प्राकृत वाक्य प्रयोग करें)
- फिर एक बार णमोकार मंत्र लेकर, शांत मन से मन्दिर से बाहर निकलें।
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9. दिगंबर–श्वेतांबर में थोड़ा अन्तर
- दोनों परंपराओं में मूल भाव एक ही हैं –
- अंतर मुख्यतः:
परंतु आत्मिक अर्थ – अहिंसा, संयम, वीतरागता, ज्ञान और ध्यान – दोनों परंपराओं में समान है।
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बहुत संक्षिप्त “दैनिक मन्दिर विधि” (यदि समय कम हो)
- मन्दिर में प्रवेश से पहले और बाद में – णमोकार मंत्र।
- भगवान के सामने खड़े होकर 3–9 बार णमोकार मंत्र जप।
- एक बार चत्तारी मंगलम्।
- शांत बैठकर 1–2 मिनट भगवान के गुणों का स्मरण।
- अंत में “मिच्छामि दुक्कडं” कहकर वापस आएँ।
मन्दिर–दर्शन के लिए कौन‑से सूत्र याद रखें, यह आप यहाँ और विस्तार से देख सकते हैं: