Gochari ke 42 dosh konase he
Gochari (मुनिराज की भिक्षा / आहार‑स्वीकार) के 42 दोष तीन मुख्य वर्गों में बताए जाते हैं। इनका अर्थ है – ऐसे 42 प्रकार की गलतियाँ, जिनसे भिक्षा देना या लेना “पाप‑युक्त” हो जाता है, इसलिए उन्हें छोड़ना ज़रूरी है।
1. उद्गमन दोष – 16 (Udgamana Dosh)
ये गृहस्थ (आहार बनाने‑वाले / देने‑वाले) की तरफ़ से होने वाली गलतियाँ हैं, जैसे:- मुनिराज के लिए विशेष अलग से खाना बनाना (आधकर्म)
- साधुओं के लिए बनाया गया भोजन सामान्य घर के भोजन से मिला देना (मित्र)
- गंदे बर्तन, गंदे हाथ, अशुद्ध स्थान से आहार देना
- जीव‑युक्त (सचेत) पदार्थों को ठीक से छान‑जाँच कर अलग न रखना
- बाजार से खास मुनिराज की भिक्षा के लिए चीजें खरीद कर लाना (कृत)
अर्थ – घर की रसोई, बर्तन, पानी, सामग्री, समय आदि सब शुद्ध हों; मुनिराज के लिए अलग‑से “विशेष प्रयास” या लोभ‑युक्त तैयारी न हो।
---
2. उत्पादन दोष – 16 (Utpadana Dosh)
ये मुनिराज की तरफ़ से, भिक्षा पाने के लिए किए जाने वाले अनुचित आचरण हैं, जैसे:- बच्चों से खेलकर, हँसाकर, उनसे लगाव दिखाकर भिक्षा लेना (धात्री आदि)
- गृहस्थों के निजी काम करना, संदेश पहुँचाना, इधर‑उधर दौड़ना (दूती आदि)
- भविष्य बताना, शुभ‑अशुभ फल कहकर लोगों को प्रभावित करना (निमित्त)
- लोभ, आसक्ति, पसंद‑नापसंद दिखाकर विशेष आहार पाने की चेष्टा करना
- विद्या, मंत्र, चमत्कार आदि दिखाकर लोगों से भिक्षा खिंचवाना
अर्थ – मुनिराज को भिक्षा केवल सहज, नियम‑संगत और निष्काम भाव से लेनी है; किसी भी तरह के लोभ, पक्षपात, दबाव या आकर्षण से नहीं।
---
3. एषणा दोष – 10 (Eshana Dosh)
ये भी मुख्यतः मुनिराज की ओर से “स्वीकार” करने के समय की गलतियाँ हैं, पर इनमें गृहस्थ की जाँच‑समझ भी आती है, जैसे:- भोजन की शुद्धि पर संदेह होना (शंकित)
- गंदे बर्तन में रखा, या गंदे हाथ से दिया गया आहार लेना (प्रक्षिप्त)
- पहले से ही किसी अशुद्ध वस्तु से स्पर्शित या भिगा हुआ आहार (निश्चित्त)
- ऊपर से किसी कपड़े, ढक्कन, या अशुद्ध चीज़ से ढका हुआ हो (पीहित)
- जीव‑युक्त चीजों के साथ मिला हुआ आहार (सम्मिश्रित)
अर्थ – जो भी भिक्षा ली जाए, वह स्थान, पदार्थ, साधन, देने वाले की मनःस्थिति – सब दृष्टि से यथासंभव निःदोष हो।
---
सार
- कुल 42 दोष = 16 उद्गमन + 16 उत्पादन + 10 एषणा
- उद्देश्य यह है कि:
परिणामस्वरूप गोचरी “निरदोष” बनती है और दाता‑ग्राही दोनों का पाप कम, पुण्य अधिक होता है।
पूरी परंपरागत सूची में हर दोष के अलग‑अलग नाम और सूक्ष्म परिभाषाएँ आती हैं, जो ग्रंथों में विस्तार से दी गई हैं; व्यवहार में इन्हें इसी तरह तीन भागों में समझाया जाता है ताकि गृहस्थ और साधु‑साध्वी दोनों आसानी से इन्हें पालन कर सकें।