Charitra upkara name and photos and use
“Charitra upkaran” से आम तौर पर मतलब होता है – संतों के वे बाहरी साधन (उपकरण) जो उनके सय्यम व चारित्र को सुरक्षित और शुद्ध रखने में मदद करते हैं।
आपने तीन बातेँ पूछी हैं – 1) नाम 2) फोटो 3) उपयोग
नीचे सरल तरीके से समझाता हूँ।
---
1. श्वेताम्बर संतों के मुख्य चरित्र-उपकरण (नाम और उपयोग)
(विभिन्न गच्छ/संप्रदाय में थोड़ा अन्तर हो सकता है)
- ओघा / ओघड़ (झोली जैसा)
- क्या है: सफेद कपड़े की थैली / झोली, कंधे से लटकाते हैं। - उपयोग: अपने थोड़े बहुत आवश्यक सामान (पुस्तक, रजोहरण, कम्बल आदि) रखने के लिए – ताकि अपरिग्रह (कम से कम वस्तुओं का उपयोग) बना रहे।
- मुँहपट्टी (मुख-निवेषणी)
- क्या है: छोटा सफेद कपड़ा जो मुँह के सामने बाँधा/पकड़ा जाता है। - उपयोग: - बोलते समय या साधना में, सूक्ष्म जीवों की रक्षा – श्वास से उनको हानि कम हो। - अहिंसा की भावना मजबूत करने के लिए।
- रजोहरण / पंखा (कमची)
- क्या है: कपड़े/ऊन के धागों से बना झाड़ू जैसा (श्वेताम्बर में नरम कपड़े का होता है)। - उपयोग: - बैठने से पहले स्थान को धीरे–धीरे साफ करना, ताकि छोटे–छोटे जीव हट जाएं, मारे न जाएँ। - चलते–फिरते भी कहीं बैठने, सोने, पूजा आदि से पहले उपयोग। - यह भी अहिंसा–पालन का साधन है।
- पुस्तकें / धर्म-ग्रन्थ
- क्या है: आगम, साधना-पाठ, स्वाध्याय की पुस्तकेँ। - उपयोग: - स्वाध्याय, प्रवचन, पाठशाला आदि के लिए। - सही ज्ञान के बिना सही चारित्र नहीं बनता, इसलिए ये भी चरित्र के सहायक हैं।
- चादर / कम्बल (संयमी वस्त्र)
- क्या है: साधु–साध्वी के वस्त्र, चादर आदि। - उपयोग: - शरीर ढकने, शीत से बचाव के लिए – परन्तु सीमित मात्रा में, ताकि अपरिग्रह बना रहे, अधिक भोग न हो।
---
2. दिगम्बर मुनियों के मुख्य चरित्र-उपकरण
दिगम्बर परम्परा में साधु वस्त्र नहीं पहनते (केवल पिच्छी व कमण्डलु जैसे उपकरण रखते हैं) – यह परम अपरिग्रह का प्रतीक है।
- पिच्छी (मोरपंख या अन्य कोमल पंखों की)
- क्या है: कोमल पंखों से बना छोटा झाड़न जैसा। - उपयोग: - बैठने की जगह, पुस्तक आदि को धीरे–धीरे साफ करना, ताकि सूक्ष्म जीव हट जाएँ। - अहिंसा की बहुत सूक्ष्म रूप से रक्षा।
- कमण्डलु (जल-पात्र)
- क्या है: लकड़ी या कद्दू/लौकी से बना छोटा पात्र। - उपयोग: - मर्यादित प्रयोजन के लिए जल रखना – शुद्धता, आचमन, छोटे–मोटे उपयोग। - अधिक बर्तनों का संग्रह न करके अपरिग्रह का पालन।
- शास्त्र / धर्म-ग्रन्थ
- उपयोग: - स्वाध्याय, प्रवचन, अध्यापन। - सम्यक् ज्ञान को पुष्ट कर के चारित्र को बल देना।
कुछ परम्पराओं में कम संख्या में और भी साधन माने जाते हैं, पर मूल भावना यही है – कम से कम वस्तु, अधिक से अधिक संयम।
---
3. “फोटो” के बारे में
मैं यहाँ सीधे तस्वीरें दिखा नहीं सकता, पर आप आसानी से देख सकते हैं:
- इंटरनेट पर सर्च करें:
इनसे आपको स्पष्ट फ़ोटो मिल जाएँगे – जहाँ आप देख पाएँगे कि
- ओघा कैसा दिखता है,
- मुँहपट्टी कैसे लगती है,
- रजोहरण / पिच्छी कैसे होते हैं, आदि।
---
4. उपयोग का आध्यात्मिक सार
सभी चरित्र-उपकरणों का मूल उद्देश्य:
- अहिंसा की रक्षा – छोटे से छोटे जीव तक को न मारना।
- अपरिग्रह – बहुत कम वस्तु रखना, इच्छाओं को सीमित करना।
- सय्यम व चारित्र –
- कम बोलना, सोच–समझ कर बोलना (मुँहपट्टी से भी स्मरण रहता है), - सावधानी से चलना–बैठना (रजोहरण/पिच्छी), - साधना और स्वाध्याय में नियमित रहना (ग्रन्थ, ओघा इत्यादि)।
इसीलिए इन्हें “चारित्र के उपकरण – Charitra Upkaran” कहा जाता है।