Ardhmagdhi aagam sahitya ka parichay or 12 upang ka itihas
नीचे संक्षिप्त व सरल रूप में उत्तर दिया जा रहा है –
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1. अर्धमागधी आगम साहित्य का परिचय
(1) अर्धमागधी क्या है?
- अर्धमागधी (अर्धमागधि) एक प्राचीन प्राकृत भाषा है।
- भगवान महावीर स्वामी ने उपदेश प्राकृत/अर्धमागधी भाषा में दिया, ताकि सामान्य जन भी समझ सकें।
- संघ में गणधर एवं आचार्यों ने इन्हीं उपदेशों को अर्धमागधी में आगम रूप में व्यवस्थित किया।
(2) आगम क्या हैं?
- “आगम” = “आगत” अर्थात् जो भगवान के ज्ञान से आया हो।
- विशेष रूप से श्वेताम्बर परम्परा में भगवान महावीर के उपदेशों का संकलन ४५ आगम के रूप में माना जाता है (११ अंग + १२ उपांग + चेदसूत्र + मूलसूत्र आदि)।
- ये आगम प्रायः अर्धमागधी/प्राकृत भाषा में रचे गये हैं, बाद में इन पर संस्कृत और देशी भाषाओं में टीकाएँ लिखी गईं।
(3) अर्धमागधी आगम साहित्य की विशेषताएँ
- सरल, बोल-चाल की भाषा, जिससे साधारण श्रावक भी सिद्धान्त समझ सके।
- विषय –
- समय के साथ स्मृति-परम्परा, परिषदें, मठों की परम्परा के कारण कुछ आगम संरक्षित रहे, कुछ को लुप्त (खोये हुए) माना जाता है, विशेषकर दिगम्बर परम्परा में।
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2. १२ उपांग (Upāṅga) आगम – नाम और संक्षिप्त परिचय
श्वेताम्बर परम्परा के अनुसार १२ उपांग आगम इस प्रकार हैं (ये मूलतः अर्धमागधी/प्राकृत में हैं):
- उववाइ (उववाइय / उपासकदशांग)
- आदर्श श्रावकों की दस कथाएँ, उनके व्रत, त्याग और धर्मानुष्ठान का वर्णन।
- रायपस्सइ (राजप्रश्नीय)
- राजाओं के प्रश्न और उनके उत्तर के माध्यम से धर्म, राजनीति, नीति, कर्म, लोक-परलोक की चर्चा।
- जीवाभिगम्म (जीवाभिगम)
- जीवों के भेद, जन्म-स्थान, गति–अगति, संवेदन-इन्द्रिय आदि का विस्तार से वर्णन।
- पण्णवणास (प्रज्ञापन / पन्नवणा)
- लोक, अलोक, नरक, देव, तिर्यंच संसार का विस्तृत वर्णन; भूगोल व कॉस्मोलॉजी से जुड़ी सामग्री।
- सूरपण्णत्ति (सूर्यप्रज्ञप्ति)
- सूर्य के उदय-अस्त, दिशा, काल-गणना आदि से सम्बन्धित वर्णन।
- जंभूद्वीपपण्णत्ति (जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति)
- जम्बूद्वीप का वर्णन, पर्वत, समुद्र, क्षेत्र, वर्णाश्रम आदि की रचना – जैन कॉस्मोग्राफ़ी का महत्वपूर्ण ग्रन्थ।
- चूल्लक्खम्म (लघु-कर्मप्राभृत / चूल्ल-कर्मप्राभृति)
- कर्म सिद्धान्त का संक्षिप्त विवरण, कर्मों के प्रकार, बन्ध–उदय आदि।
- महाक्खम्म (महाकर्मप्राभृत)
- कर्म सिद्धान्त का विस्तृत वर्णन, अनेक दृष्टांतों के साथ।
- पुत्तपत्त (पुत्तपाहुड / पुत्तपद)
- पुत्र-पुत्री, वंश, गृहस्थ जीवन की दृष्टि से धर्माचार की बातें, कुछ स्थानों पर विवादित/लुप्त अंश।
- सरावग्गपण्णत्ति (श्रावकप्रज्ञप्ति)
- श्रावकधर्म – छोटे-बड़े व्रत, प्रतिमा, दान, अनुशासन आदि।
- संठार (संथारक / संस्तारक)
- संलेखना (सल्लेखना), संथारा आदि विषय; मृत्यु की तैयारी, वैर-त्याग, शुद्ध भाव से देह परित्या्ग की विधि।
- तैयस्सर (त्रिरश्टि-शालाका पुरुष चरित / तयस्सरिय-पहुड)
- 63 शलाकापुरुषों के चरित्र (तीर्थंकर, चक्रवर्ती, बलभद्र आदि) – इतिहास, चरित्र, आदर्श जीवन।
(नामों में थोड़ी उच्चारण/लेखन भिन्नता श्वेताम्बर ग्रन्थ-सूची के अनुसार मिलती है, पर मूल १२ का क्रम यही माना जाता है।)
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3. १२ उपांगों का इतिहास (संक्षेप में)
(1) उत्पत्ति
- ये सभी उपांग, मूल अंग-आगमों (विशेषतः ४ से १२वें अंग से सम्बन्धित) की व्याख्यात्मक, पूरक रचनाएँ हैं।
- प्रारम्भिक काल में गणधर और उनके शिष्य इन्हें मौखिक रूप से कंठस्थ रखते थे।
- आगे चलकर विभिन्न परिषदों (वलभी आदि) में इन्हें लिखित रूप में संकलित किया गया (श्वेताम्बर परम्परा का मत)।
(2) परम्परागत मत – श्वेताम्बर और दिगम्बर
- श्वेताम्बर परम्परा
- दिगम्बर परम्परा
(3) वर्तमान स्थिति
- श्वेताम्बर मठों, जैन पुस्तकालयों, जैन विद्यापीठों आदि में १२ उपांगों की अनेक प्रतियाँ, टीकाएँ, भाषा-अनुवाद (हिन्दी, गुजराती आदि) मिलते हैं।
- १२ उपांग, विशेषकर जीवाभिगम, प्रज्ञापन, जम्बूद्वीपप्रज्ञप्ति, सूर्यप्रज्ञप्ति, श्रावकप्रज्ञप्ति, संथारक – आज भी अध्ययन व प्रवचन में बहुत उपयोगी माने जाते हैं।
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4. संक्षिप्त निष्कर्ष
- अर्धमागधी आगम साहित्य = भगवान महावीर के उपदेशों को प्राकृत/अर्धमागधी भाषा में संकलित रूप, जिसमें ११ अंग, १२ उपांग आदि सम्मिलित हैं (श्वेताम्बर परम्परा)।
- १२ उपांग आगम, अंगों के विस्तार और अनुप्रयोग के रूप में – जीव, लोक, कर्म, श्रावकाचार, इतिहास, संलेखना आदि विषयों को सरल भाषा में समझाते हैं।
- श्वेताम्बर इन्हें वैधिक आगम मानते हैं, जबकि दिगम्बर परम्परा इन्हें मूल-आगम के समकक्ष प्रमाणिक नहीं मानती, बल्कि आगे के ग्रन्थ मानती है।
४५ आगमों का संक्षिप्त परिचय आप यहाँ विस्तार से पढ़ सकते हैं: