चंद्रप्रभ-प्रभोश्चन्द्र मरीचि-निचयोज्ज्वला | मूर्तिमूर्त-सितध्यान निर्मितेव श्रियेऽस्तु वः
इस श्लोक का सरल अर्थ इस प्रकार है:
मूल श्लोक “चंद्रप्रभ-प्रभोश्चन्द्र मरीचि-निचयोज्ज्वला । मूर्तिमूर्त-सितध्यान निर्मितेव श्रियेऽस्तु वः ॥”
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शब्दार्थ (सरल)
- चंद्रप्रभ-प्रभोः – भगवान चन्द्रप्रभ प्रभु की
- चन्द्र-मरीचि-निचय-उज्ज्वला – जो चन्द्रमा की किरणों के समूह के समान अत्यन्त उज्ज्वल है
- मूर्ति-अमूर्ति-सित-ध्यान-निर्मिता इव – जैसे साकार (दिखने वाली) और निराकार (अदृश्य) श्वेत, शान्त ध्यान से निर्मित हुई हो
- श्रियः अस्तु वः – वह (ऐसी) शोभा / शुभ सम्पदा आप सब पर हो
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भावार्थ (सरल हिन्दी में)
हे भगवान चन्द्रप्रभ! आपकी वह दिव्य, चाँद की किरणों जैसी उज्ज्वल, श्वेत और शान्त ध्यान से बनी हुई लगने वाली पवित्र आभा हम सबके ऊपर सदैव शुभता, शांति और कल्याण के रूप में बनी रहे – ऐसी मंगल कामना है।
यह श्लोक भगवान चन्द्रप्रभ तीर्थंकर की देह की चन्द्रमा-सी श्वेत, शीतल, शांत प्रभा और उनके निष्कलंक, निर्मल ध्यान की महिमा का स्तवन करता है और प्रार्थना करता है कि ऐसी पवित्र “श्रि” (मंगलमयता / कल्याण) हम सब पर बनी रहे।