Nav anga puja
Nav Anga Puja (या नव-अंग पूजा) का साधारण अर्थ है – भगवान के शरीर के 9 पवित्र अंगों पर चंदन / केसर आदि से पूजा करके, उन गुणों को अपने जीवन में लाने की भावना करना।
1. यह पूजा कब होती है?
आमतौर पर:- अभिषेक / स्नात्र पूजा के बाद
- या अष्टप्रकारी पूजा के साथ / बाद में
- श्वेताम्बर परम्परा में ज़्यादा प्रचलित
2. “नव अंग” कौन‑कौन से हैं?
क्रम थोड़ा बदल भी सकता है, पर सामान्य रूप से नौ बिंदु ये माने जाते हैं:
- दोनों पैर के अंगूठे (Right toe, Left toe)
- दोनों घुटने (Right knee, Left knee)
- दोनों भुजा का मध्य भाग (Right arm, Left arm)
- दोनों कंधे (Right shoulder, Left shoulder)
- सिर का मध्य भाग (Top of head – शिखर)
- ललाट / माथे का मध्य (Forehead center)
- गला / कंठ (Throat center)
- हृदय / वक्षस्थल का मध्य (Chest center)
- नाभि (Navel)
हर बिंदु पर थोड़ा सा चंदन लगाकर, नमन और स्तुति की जाती है।
3. साधारण मंत्र क्रम (श्वेताम्बर परम्परा)
बहुत जगह पर नौ बिंदुओं के साथ नवकार मंत्र की नौ पंक्तियाँ / पद या सम्बंधित पंक्तियाँ ली जाती हैं। एक सरल रूप:
- पैर के अंगूठे – “णमो अरिहंताणं”
- घुटने – “णमो सिद्धाणं”
- भुजा – “णमो आयरियाणं”
- कंधे – “णमो उवज्झायाणं”
- सिर – “णमो लोए सव्वसाहूणं”
- माथा – “एसो पंच नमुक्कारो”
- गला – “सव्व पावप्पणासणो”
- हृदय – “मंगलाणं च सव्वेसिं”
- नाभि – “पधमं हवई मंगलं” (या “जिण चित्तम्मे…” आदि परम्परा अनुसार)
कुछ स्थानों पर अलग‑अलग नवांग दोहा / स्तुति भी पढ़ी जाती है।
4. प्रत्येक अंग का सरल भाव (भक्ति‑भावना)
बहुत संक्षेप में, भाव ऐसा रखा जाता है:
- पैर – हे प्रभु! आपने अनगिनत जीवों का उपकार करने के लिए दूर‑दूर तक पैदल विहार किया, मैं भी धर्ममार्ग पर चलूँ।
- घुटने – मैं भी विनम्र बनूँ, अहंकार छोड़ूँ, सदा झुकने योग्य सत्य को स्वीकार करूँ।
- भुजा – मेरी शक्ति, पराक्रम, मेहनत – सब धर्म और दया में लगें, हिंसा में नहीं।
- कंधे – आप पर समस्त लोक का भार भी हल्का था, क्योंकि राग‑द्वेष शून्य थे; मैं भी कषायों का भार कम करूँ।
- सिर – आपके मस्तक पर अनन्त ज्ञान और दर्शन का तेज था; मुझे भी सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान की प्रेरणा मिले।
- माथा – मेरा मन शान्त व एकाग्र रहे, विकारों से मुक्त हो।
- गला – मेरी वाणी मीठी, सत्य और अहिंसा से युक्त रहे; किसी जीव को चोट पहुँचाने वाली न हो।
- हृदय – हृदय में करुणा, मैत्री, क्षमा और परोपकार की भावना बढ़े।
- नाभि – पूरे जीवन का केन्द्र धर्म बने, भोग‑विलास नहीं; भीतर से शुद्धता और संयम उपजे।
5. संक्षिप्त विधि (बहुत सरल रूप)
- स्नान, स्वच्छ वस्त्र, पवित्र मन।
- मंदिर में प्रतिमा/प्रतिष्ठित भगवान के सामने खड़े या बैठे।
- नवकार मंत्र 3 बार जप।
- थाली में चंदन / केसर का लेप तैयार करें।
- ऊपर बताए क्रम से 9 बिंदुओं पर चंदन लगाएँ,
- हर अंग पर सम्बंधित पंक्ति बोलेँ, - और मन ही मन उसका भाव करें।
- अंत में प्रभु के चरणों में बैठकर थोड़ी देर शान्त ध्यान / जप करें और क्षमायाचना करें।
यदि आप चाहें तो मैं अलग‑अलग नव अंग पर बोले जाने वाले छोटे‑छोटे दोहे / चौपाई भी सरल रूप में लिख सकता हूँ।