छः ढाला आर्थ साहित
“छः ढाला” (या “छहढाला”) पं. दौलतरामजी द्वारा रचित एक बहुत प्रसिद्ध जैन ग्रंथ है। इसे जैन पाठशालाओं में विशेष रूप से पढ़ाया जाता है, क्योंकि इसमें पूरे जैन धर्म का सार बहुत सरल भाषा में समझाया गया है।
आपने “आर्थ साहित” लिखा है, यानी आपको मूल के साथ अर्थ/भावार्थ चाहिए। पूरा “छः ढाला” (मूल + भावार्थ) काफ़ी लम्बा है, इसलिए यहाँ पूरा ग्रंथ देना सम्भव नहीं है, पर इसका संक्षिप्त परिचय और मुख्य बातें इस तरह समझ सकते हैं:
- नाम का अर्थ – “छः ढाला”
- “ढाला” = खण्ड / भाग / अध्याय
- “छः ढाला” = ऐसे छह भाग जिनमें धर्म का सार बताया गया है।
- प्रत्येक ढाला में गाथाएँ (छन्द) हैं, जो सरल बोलचाल की भाषा में लिखी गई हैं।
- ग्रंथ का मुख्य विषय
बहुत संक्षेप में, छः ढालों में ये बातें समझाई जाती हैं (शब्दावली सरल कर के): 1) जीव की सही पहचान – - “मैं कौन हूँ?” – शरीर नहीं, आत्मा हूँ। - आत्मा के लक्षण, ज्ञान-दार्शन-चरित्र इत्यादि।
2) मिथ्यात्व और सम्यक्दर्शन – - गलत मान्यताएँ (मिथ्यात्व) क्या हैं? - सही दृष्टि (सम्यक्दर्शन) कैसे होती है? - गुरु, देव, धर्म में सही श्रद्धा क्यों आवश्यक है?
3) पाप–पुण्य और कर्म सिद्धान्त – - अच्छा–बुरा कर्म कैसे बँधता है? - कैसी प्रवृत्ति पाप कहलाती है, कैसी पुण्य? - अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह का महत्व।
4) व्रत–अनुव्रत और चारित्र – - श्रावक के बारह व्रतों का सार। - संयम, सयंमित आहार, इन्द्रियनिग्रह आदि।
5) साधना के साधन – - स्वाध्याय, ध्यान, सामायिक, प्रयास्चित, प्रतिक्रमण आदि। - किस तरह रोजमर्रा जीवन में साधना जोड़ें।
6) फल–लाभ और आत्मकल्याण – - सही धर्मपालन से कौन–कौन से आध्यात्मिक लाभ होते हैं। - जन्म–मरण के चक्र से छूटने की दिशा में आत्मा कैसे आगे बढ़ती है।
- परम्परा के अनुसार अर्थ
- “छः ढाला” मूल रूप से जैन सिद्धांतों पर आधारित है, इसलिए इसका अर्थ देते समय दूसरे मत या आधुनिक व्यक्तिगत विचार नहीं जोड़े जाते।
- अलग–अलग जैन सम्प्रदाय (दिगम्बर/श्वेताम्बर) मुख्य तत्त्वों में इसे समान रूप से मानते हैं, केवल कुछ टीकाओं/व्याख्याओं की शैली में भिन्नता हो सकती है, पर मूल आध्यात्मिक भाव यही रहता है:
- “छहढाला सार्थ”
आपको जो “आर्थ साहित” रूप में चाहिए, वह परम्परागत रूप से अलग–अलग पुस्तक रूप में मिलता है, जैसे –
- “छहढाला सार्थ – पं. दौलतरामजी रचित, सरल अर्थ सहित”
यदि आप छः ढाला को सीखना चाहते हैं, तो उत्तम तरीका यह है:
- घर या पाठशाला में प्रचलित “छहढाला सार्थ” पुस्तक से रोज़ 1–2 गाथाएँ लेकर
- पहले मूल पढ़ें, फिर शब्दार्थ, फिर भावार्थ देखें
- और किसी जानकार गुरु/शिक्षक से सही उच्चारण और अर्थ की पुष्टि करते हुए याद करें।
इस तरह आप पूरा “छः ढाला” न केवल पढ़ पाएँगे, बल्कि उसका सही आध्यात्मिक अर्थ भी समझ पाएँगे, जो जैन धर्म अभ्यास का मजबूत आधार बनता है।