ये तीनों शब्द जैन दर्शन में “तीन विशेष करणा (त्रि‑करण)” कहलाते हैं। ये आत्मा के भीतर होने वाली बहुत गहरी आध्यात्मिक प्रक्रियाएँ हैं, जिनसे कर्मों का क्षय (निर्जरा) तेज़ी से होने लगता है और गुणस्थान आगे बढ़ते हैं।
मैं बहुत सरल शब्दों में समझाता हूँ:
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1. यथाप्रवृत्ति‑करण (Yathā‑pravr̥tti‑karaṇa)
अब तक जैसे‑जैसे कर्म क्षय करने की प्रवृत्ति चल रही थी, उसी दिशा में, उसी धारा को और तेज़ व शुद्ध बनाना – यही यथाप्रवृत्ति‑करण है।
जैसे कोई साधक बरसों से साधना कर रहा हो, अब वो ज्यादा सजग, ज्यादा शुद्ध प्रयास करने लगे – पर अभी “नया” कुछ नहीं हुआ, बस पुरानी साधना की रफ़्तार और शुद्ध हो गई – यह अवस्था यथाप्रवृत्ति‑करण है।
- यह 7वें गुणस्थान (अप्रमत्त‑संयत) से जुड़ी प्रक्रिया मानी जाती है।
- इसमें मोहनीय कर्म की “मोटी परतें” कुछ कम होती हैं, पर भीतर की “गांठ” अभी नहीं टूटी होती।
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2. अपूर्व‑करण (Apūrva‑karaṇa)
“अपूर्व” = जो पहले कभी न हुआ हो, नया।
यानी – “पहले जैसा कभी न हुआ हो, ऐसा नया आध्यात्मिक पुरुषार्थ/परिवर्तन।”
ऐसी अनोखी, पहले से अधिक प्रबल और सूक्ष्म आध्यात्मिक लगन, जिससे:
- पुराने कषाय (राग‑द्वेष, क्रोध, मान आदि) की “कड़ी गाँठ” ढीली होने लगती है,
- मोहनीय कर्म के सूक्ष्म बंधन टूटने की शुरुआत होती है।
- यह 8वाँ गुणस्थान ही “अपुर्व‑करण गुणस्थान” कहलाता है।
- यहाँ साधक का पुरुषार्थ और भीतर की शुद्धि बहुत तेज़ और नई तरह की हो जाती है – इसलिए इसे “अपूर्व” कहा गया है।
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3. अनिवृत्ति‑करण (Anivṛtti‑karaṇa / Anivartti‑karaṇa)
“अनिवृत्ति” = वापस न लौटना।
यानी – ऐसी आध्यात्मिक अवस्था, जहाँ से साधक अब नीचे की अवस्थाओं में नहीं गिरता।
- ऐसी पक्की, दृढ़ आध्यात्मिक स्थिति कि:
- अब साधक की दिशा केवल आगे (उच्च गुणस्थान) की ओर होती है,
- वह फिर से पूर्व की गिरी हुई अज्ञान/मिथ्यात्व वाली अवस्था में नहीं लौटता।
- कषाय अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं, पर इतने कमजोर हो जाते हैं कि गिरावट (डाउन‑फॉल) की संभावना नहीं रहती।
- यह 9वाँ गुणस्थान – “अनिवृत्ति‑करण / अनिवर्ती‑बादर‑साम्प्राय” कहलाता है।
- यहाँ से आगे साधक की यात्रा मोक्ष की ओर एकदम स्थिर दिशा में मानी जाती है।
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संक्षेप में तीनों का आपसी अंतर
पहले से चल रही साधना/कर्म‑क्षय की धारा को और अधिक शुद्ध, अधिक सजग बनाना।
एक “नया”, पहले से अधिक शक्तिशाली और सूक्ष्म आध्यात्मिक पुरुषार्थ, जिससे कषाय की गहरी गाँठ टूटने लगती है।
इतनी दृढ़ और उन्नत अवस्था कि अब साधक नीचे की आध्यात्मिक स्थिति में
वापस नहीं गिरता, बस आगे ही बढ़ता है।
ये तीनों करणा “भव्य जीव” के लिए बताए गए हैं, और इन्हीं के बल पर वह 7वें से 9वें गुणस्थान तक, और आगे मोक्ष‑मार्ग पर प्रगति करता है।