आदिनाथ भगवान के अरिहंत पद उपार्जन की कहानी बताओ
आदिनाथ भगवान के अरिहंत पद (केवलज्ञान) की कथा – सरल रूप में
आदिनाथ भगवान (ऋषभदेव) जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर हैं। अरिहंत पद का अर्थ है – ऐसा परमात्मा, जिसने भीतर बैठे सभी कषाय‑शत्रुओं (क्रोध, मान, माया, लोभ आदि) को जीत लिया हो और जिसे केवलज्ञान प्रकट हो गया हो।
नीचे उनकी अरिहंत पद की यात्रा संक्षेप में:
---
1. राजवैभव से वैराग्य तक
- जन्म: अयोध्या में राजा नाभिराय और रानी मरूदेवी के यहाँ।
- वे महान सम्राट बने, असंख्य देशों पर राज्य किया, लोगों को
- एक दिन सभा में बैठे‑बैठे उन्होंने अपने नौ ग्रहों के सिंहासन टूटते देखे (यह जैन ग्रंथों में वर्णित है)। इससे उन्हें संसार की अनित्यता का गहरा वैराग्य हुआ –
यहीं से उनके भीतर मोक्ष की तीव्र इच्छा जागी।
---
2. दीक्षा – संसार छोड़कर साधु बनना
- उन्होंने अपने पुत्रों को राज्य सौंप दिया, मंत्रियों से विदा ली।
- रानी मरूदेवी, पुत्र‑पुत्रियाँ, नागरिक – सब रो रहे थे, पर भगवान के मन में अडिग वैराग्य था।
- वे अयोध्या में ही विशाल जनसमूह के बीच केश‑लोचन कर दीक्षित हुए, दिगंबर जैन मुनि बने।
अब वे भिक्षा से जीवन यापन करने वाले साधु थे, पर एक समस्या थी…
---
3. भिक्षा न मिलने का कारण – शुद्ध त्याग की परंपरा की शुरुआत
उस समय तक संसार में भिक्षा देने की परंपरा ही नहीं थी, क्योंकि पहले लोग भोगभूमि में स्वयंसिद्ध पदार्थों से जीते थे।
- मुनिराज ऋषभदेव नगर‑नगर गए, किंतु किसी को पता ही नहीं था कि साधु को भोजन कैसे और कब दिया जाए।
- लोग या तो पूरा भोजन दे देते, या उनके सामने खाते रहते, कोई नियम‑शुचिता नहीं थी, इसलिए भगवान कुछ भी ग्रहण नहीं करते थे।
इस तरह वे एक वर्ष तक बिना आहार के तपश्चर्या करते रहे। यह अत्यंत कठोर तप था, पर उनके भीतर की आत्मशक्ति बढ़ती गई।
---
4. अक्षय तृतीया – पहली बार आहार ग्रहण
एक वर्ष बाद, जिस दिन उन्हें भिक्षा का योग्य दानदाता और योग्य आहार मिलेगा, तभी वे भिक्षा ग्रहण करेंगे – ऐसा उनका संकल्प था।
- उस दिन अक्षय तृतीया थी।
- वे अपने रिश्तेदार राजा श्रीयांस (या क्षेत्रपाल श्रीयांसकुमार) के नगर पहुँचे।
- श्रीयांसकुमार ने पूर्वजन्म के संस्कार से पहचान लिया –
शुद्ध मन, नियम और विनय सहित उन्होंने भगवान को इक्षुरस (गन्ने का रस) अर्पित किया। भगवान ने उसे नियमपूर्वक ग्रहण किया। यही जैन परंपरा में पहला आहार और “अक्षय तृतीया” पर्व का कारण माना जाता है।
---
5. दीर्घ तप – कषायों का पूर्ण क्षय
आहार के बाद भी भगवान ने दीर्घकाल तक कठोर तप, ध्यान, स्वाध्याय, गुणानुवाद, और निरंतर आत्मचिंतन किया।
- वे एकांत स्थानों, वन‑उद्यानों में ध्यानस्थ रहते।
- भीतर‑भीतर
कर्मों के घातिया बंध (ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय, अंतराय आदि) धीरे‑धीरे क्षीण होते‑होते एक समय पूरी तरह नष्ट हो गए।
---
6. केवलज्ञान की प्राप्ति – अरिहंत पद
जब सभी घातिया कर्म पूरी तरह नष्ट हो गए, तब मुनि ऋषभदेव को केवलज्ञान प्रकट हुआ।
इस अवस्था में –
- उन्हें संपूर्ण लोक‑आलोक, अतीत‑भविष्य‑वर्तमान का प्रत्यक्ष ज्ञान हो गया।
- वे सर्वज्ञ, सर्वदर्शी हो गए।
- भीतर पूरी तरह शांन्त, निष्कषाय, राग‑द्वेष रहित –
इंद्रों ने उनके लिए दिव्य समवसरण की रचना की – एक ऐसा दिव्य उपदेश‑मंडप, जहाँ
- देव, मनुष्य, तिर्यंच, सब प्राणी
- अपने‑अपने रूप में आकर
- बिना बाधा, बिना डर,
यहीं से उन्होंने धर्म‑चक्र प्रवर्तन किया – अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह और सम्यक दर्शन‑ज्ञान‑चरित्र का उपदेश दिया।
अब वे तीर्थंकर अरिहंत के रूप में जगत के उपकारी बन चुके थे।
---
7. परंपरागत भेद – (दिगंबर / श्वेतांबर)
- दिगंबर परंपरा में यह कथा इसी प्रकार आती है –
- श्वेतांबर परंपरा में भी मुख्य प्रसंग समान हैं,
---
इस तरह आदिनाथ भगवान ने अपने अंदर के सभी कषायों पर विजय पाकर अरिहंत पद अर्जित किया, और अनगिनत जीवों को मोक्ष‑मार्ग दिखाया।