Jain Knowledge
Menu
  • JainGPT
  • Jain Directory
    • Jain Tirthsthaans
    • Jain Sangeetkars
    • Jain Pandits
    • Jain Acharya
    • Jain Businessman
  • Jain Media
    • Jain Stavan
    • Jain Pachkhan
    • Jain Stories
    • Jain Sutras
    • Jain Facts / Concepts
  • Advertise with us
Jain Knowledge
login Register

Get In Touch

phone
info@jainknowledge.com

online support

phone
Mumbai

India

  • Home
  • Jain Questions
  • आदिनाथ भगवान के अरिहंत पद उपार्जन की कहानी बताओ
  • author Posted by
    Jain Follower

    आदिनाथ भगवान के अरिहंत पद उपार्जन की कहानी बताओ

    5 months ago 83

    आदिनाथ भगवान के अरिहंत पद (केवलज्ञान) की कथा – सरल रूप में

    आदिनाथ भगवान (ऋषभदेव) जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर हैं। अरिहंत पद का अर्थ है – ऐसा परमात्मा, जिसने भीतर बैठे सभी कषाय‑शत्रुओं (क्रोध, मान, माया, लोभ आदि) को जीत लिया हो और जिसे केवलज्ञान प्रकट हो गया हो।

    नीचे उनकी अरिहंत पद की यात्रा संक्षेप में:

    ---

    1. राजवैभव से वैराग्य तक

    • जन्म: अयोध्या में राजा नाभिराय और रानी मरूदेवी के यहाँ।
    • वे महान सम्राट बने, असंख्य देशों पर राज्य किया, लोगों को
    - खेती (कृषि) - व्यापार (वाणिज्य) - शिल्प‑कला - लिपि, गणित आदि सिखाकर भोगभूमि से कर्मभूमि की शुरुआत करवाई।
    • एक दिन सभा में बैठे‑बैठे उन्होंने अपने नौ ग्रहों के सिंहासन टूटते देखे (यह जैन ग्रंथों में वर्णित है)। इससे उन्हें संसार की अनित्यता का गहरा वैराग्य हुआ –
    “इतना बड़ा साम्राज्य भी नाशवान है, तो फिर स्थाई क्या है?”

    यहीं से उनके भीतर मोक्ष की तीव्र इच्छा जागी।

    ---

    2. दीक्षा – संसार छोड़कर साधु बनना

    • उन्होंने अपने पुत्रों को राज्य सौंप दिया, मंत्रियों से विदा ली।
    • रानी मरूदेवी, पुत्र‑पुत्रियाँ, नागरिक – सब रो रहे थे, पर भगवान के मन में अडिग वैराग्य था।
    • वे अयोध्या में ही विशाल जनसमूह के बीच केश‑लोचन कर दीक्षित हुए, दिगंबर जैन मुनि बने।

    अब वे भिक्षा से जीवन यापन करने वाले साधु थे, पर एक समस्या थी…

    ---

    3. भिक्षा न मिलने का कारण – शुद्ध त्याग की परंपरा की शुरुआत

    उस समय तक संसार में भिक्षा देने की परंपरा ही नहीं थी, क्योंकि पहले लोग भोगभूमि में स्वयंसिद्ध पदार्थों से जीते थे।

    • मुनिराज ऋषभदेव नगर‑नगर गए, किंतु किसी को पता ही नहीं था कि साधु को भोजन कैसे और कब दिया जाए।
    • लोग या तो पूरा भोजन दे देते, या उनके सामने खाते रहते, कोई नियम‑शुचिता नहीं थी, इसलिए भगवान कुछ भी ग्रहण नहीं करते थे।

    इस तरह वे एक वर्ष तक बिना आहार के तपश्चर्या करते रहे। यह अत्यंत कठोर तप था, पर उनके भीतर की आत्मशक्ति बढ़ती गई।

    ---

    4. अक्षय तृतीया – पहली बार आहार ग्रहण

    एक वर्ष बाद, जिस दिन उन्हें भिक्षा का योग्य दानदाता और योग्य आहार मिलेगा, तभी वे भिक्षा ग्रहण करेंगे – ऐसा उनका संकल्प था।

    • उस दिन अक्षय तृतीया थी।
    • वे अपने रिश्तेदार राजा श्रीयांस (या क्षेत्रपाल श्रीयांसकुमार) के नगर पहुँचे।
    • श्रीयांसकुमार ने पूर्वजन्म के संस्कार से पहचान लिया –
    “ये कोई साधारण भिक्षुक नहीं, स्वयं मेरे कुलदेव आदिनाथ हैं, जिन्हें मैं शुद्ध भावना से आहार दूँ।”

    शुद्ध मन, नियम और विनय सहित उन्होंने भगवान को इक्षुरस (गन्ने का रस) अर्पित किया। भगवान ने उसे नियमपूर्वक ग्रहण किया। यही जैन परंपरा में पहला आहार और “अक्षय तृतीया” पर्व का कारण माना जाता है।

    ---

    5. दीर्घ तप – कषायों का पूर्ण क्षय

    आहार के बाद भी भगवान ने दीर्घकाल तक कठोर तप, ध्यान, स्वाध्याय, गुणानुवाद, और निरंतर आत्मचिंतन किया।

    • वे एकांत स्थानों, वन‑उद्यानों में ध्यानस्थ रहते।
    • भीतर‑भीतर
    - क्रोध - मान - कपट - लोभ और राग‑द्वेष के सूक्ष्म से सूक्ष्म कणों को भी देखते, समझते, और त्यागते गए।

    कर्मों के घातिया बंध (ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय, अंतराय आदि) धीरे‑धीरे क्षीण होते‑होते एक समय पूरी तरह नष्ट हो गए।

    ---

    6. केवलज्ञान की प्राप्ति – अरिहंत पद

    जब सभी घातिया कर्म पूरी तरह नष्ट हो गए, तब मुनि ऋषभदेव को केवलज्ञान प्रकट हुआ।

    इस अवस्था में –

    • उन्हें संपूर्ण लोक‑आलोक, अतीत‑भविष्य‑वर्तमान का प्रत्यक्ष ज्ञान हो गया।
    • वे सर्वज्ञ, सर्वदर्शी हो गए।
    • भीतर पूरी तरह शांन्त, निष्कषाय, राग‑द्वेष रहित –
    यहीं उन्हें “अरिहंत” कहा जाता है – “अरि” = शत्रु (कषाय), “हंत” = हरण करने वाले (जिन्होंने शत्रु खत्म कर दिए)।

    इंद्रों ने उनके लिए दिव्य समवसरण की रचना की – एक ऐसा दिव्य उपदेश‑मंडप, जहाँ

    • देव, मनुष्य, तिर्यंच, सब प्राणी
    • अपने‑अपने रूप में आकर
    • बिना बाधा, बिना डर,
    भगवान की दिव्य ध्वनि (प्रवचन) सुनते हैं।

    यहीं से उन्होंने धर्म‑चक्र प्रवर्तन किया – अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह और सम्यक दर्शन‑ज्ञान‑चरित्र का उपदेश दिया।

    अब वे तीर्थंकर अरिहंत के रूप में जगत के उपकारी बन चुके थे।

    ---

    7. परंपरागत भेद – (दिगंबर / श्वेतांबर)

    • दिगंबर परंपरा में यह कथा इसी प्रकार आती है –
    एक वर्ष के उपवास के बाद अक्षय तृतीया को श्रीयांसकुमार से इक्षुरस ग्रहण, दीर्घ तप के बाद केवलज्ञान, फिर समवसरण में प्रथम उपदेश।
    • श्वेतांबर परंपरा में भी मुख्य प्रसंग समान हैं,
    कुछ स्थानों/समयों के नामों में अंतर हो सकता है, पर भाव और सार दोनों परंपराओं में एक ही है – राजवैभव से वैराग्य, दीक्षा, कठोर तप, और केवलज्ञान द्वारा अरिहंत पद की प्राप्ति।

    ---

    इस तरह आदिनाथ भगवान ने अपने अंदर के सभी कषायों पर विजय पाकर अरिहंत पद अर्जित किया, और अनगिनत जीवों को मोक्ष‑मार्ग दिखाया।

    About Jain Knowledge

    JainGPT by JainKnowledge.com is India’s first AI-powered platform dedicated entirely to Jainism. Here, you can ask any question related to Jain Dharma — from rituals and history to philosophy and daily practices — and receive instant, accurate answers rooted in Jain principles.

    Our mission is to make Jain knowledge accessible to all, especially the next generation, through the power of technology. Whether you're a curious student or a lifelong seeker, JainGPT is your trusted digital guide for all things Jain.

    Authentic Jain knowledge, made simple and accessible for every generation.
    Follow Us
    Facebook ↗ Instagram ↗

    Stay connected for Jain knowledge, insights and community updates.

    Jain Knowledge

    JainGPT by JainKnowledge.com is India’s first AI-powered platform dedicated entirely to Jainism. Ask questions related to Jain Dharma, rituals, history, philosophy and daily practices, and receive answers rooted in Jain principles.

    Explore
    • JainGPT
    • Jain Directory
    • Jain Media
    • Advertise With Us
    • Disclaimer
    Our Mission

    Our mission is to make Jain knowledge accessible to all, especially the next generation, through the power of technology. Whether you're a curious student or a lifelong seeker, JainGPT is your trusted digital guide for all things Jain.

    info@jainknowledge.com Online support
    Mumbai India

    Copyright © 2026 Jain Knowledge

    Created by Katalyst Corp.