Shantinath vidhan procedure
Shantinath Vidhan is usually done as “Shri Shantinath Mandal Vidhan” – a special pooja of Bhagwan Shantinath for shanti (peace) and kalyan. Procedure can be long/short and also varies a little by sangh, so I’ll give a simple, safe, samanya (general) क्रम you can follow at home.
---
1. तैयारी (Preparation)
- स्थान तैयार करें
- साफ़, शान्त जगह चुनें - चावल या सफेद कपड़े पर छोटा मंडल / चौकी बनायें - बीच में श्री शान्तिनाथ भगवान का चित्र/प्रतिमा स्थापित करें
- सामग्री (basic)
- जल, अक्षत (चावल), फूल, दीपक, अगरबत्ती - थोड़ी-सी केसर/चंदन, रोली, नारियल या सूखे मेवे - यदि संभव हो: द्रव्यों से अष्ट-प्रकारी पूजन (जल, चंदन, अक्षत, पुष्प, नैवेद्य, दीप, धूप, फल)
- स्वच्छता
- स्नान, स्वच्छ वस्त्र, मन में शांत भावना - मन में अहिंसा, क्षमा, मैत्री की भावना रखें
---
2. प्रारम्भ – नमस्कार और संकल्प
- नवकार मंत्र / पंच-परमेष्ठी नमस्कार
- सबसे पहले नवकार मंत्र या पंच-परमेष्ठी को नमस्कार करें - फिर विशेष रूप से भगवान शान्तिनाथ को प्रणाम
- संकल्प (man mein)
- “मैं आज भगवान शान्तिनाथ की पूजा / विधान शान्ति, सद्बुद्धि और सब जीवों के कल्याण के लिए कर रहा/रही हूँ, न किसी को हानि पहुँचाने के लिए और न केवल सांसारिक लाभ के लिए।”
---
3. स्तापना और मंगलाचरण
- आसन व स्तापना
- भगवान के सामने दाहिने हाथ से थोड़े अक्षत रखकर - मंदिर, देव, शास्त्र, गुरु और भगवान शान्तिनाथ की स्तापना-भावना करें
- मंगल पाठ (short)
- नवकार मंत्र - “उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच…” जैसे गुणस्मरण, या - छोटा-सा शान्तिकर्म / शान्तिकारक श्लोक (जैसे “सर्वे भवन्तु सुखिनः” प्रकार की सार्वभौमिक शुभकामना – जैन शैली में सब जीवों के मंगल की भावना)
---
4. अभिषेक (यदि सम्भव हो)
यदि आपके पास छोटी प्रतिमा है और घर पर अभिषेक करना आपकी परम्परा में मान्य है:
- जलग्रहण
- स्वच्छ पात्र में जल लें, - भगवान के ऊपर धीरे-धीरे जलाभिषेक करें - साथ में नवकार मंत्र या “ओम् ह्रीं शान्तिनाथाय नमः” जैसे पारम्परिक जप (यदि आपके घर में बोला जाता हो)
- पोंछना व चंदन
- साफ रुमाल से प्रतिमा पोंछें - चंदन/केसर का तिलक लगायें
यदि प्रतिमा पर अभिषेक न हो सके (केवल चित्र हो), तो बस जल की आचमन-भावना करें – जल को भगवान के नाम से अपने सिर से लगा लें, और मन में सोचें “अभिषेक भगवान पर चढ़ा हुआ मानता/मानती हूँ।”
---
5. अष्ट-प्रकारी पूजन (सरल रूप)
क्रम सामान्यतः (थोड़ी भिन्नता हो सकती है):
- जल – पवित्रता की भावना से
- चंदन – शीतलता, शान्ति, समाधि की भावना
- अक्षत – स्थिरता, अविच्छिन्न श्रद्धा
- पुष्प – सद्गुणों की सुगंध
- धूप – पाप- मलिनता दूर हो, ऐसा भाव
- दीपक – सम्यक् ज्ञान का प्रकाश प्रकट हो
- नैवेद्य / फल / मिठाई – आसक्ति छोड़कर, केवल भाव से अर्पण
- (जहाँ जैसा प्रचलन हो उसी के अनुसार अनुकरण करें)
हर द्रव्य चढ़ाते समय:
- कम से कम नवकार मंत्र
- या भगवान शान्तिनाथ के नाम का जप करें
---
6. शान्तिनाथ सम्बन्धी पाठ / स्तुति
घर पर सरल रूप से आप यह कर सकते हैं:
- भगवान शान्तिनाथ का गुणानुशालन
- जैसे: - “हे शान्तिनाथ भगवान, आप अनन्त ज्ञान- दर्शन से युक्त, सम्यक् शान्ति स्वरूप हैं…” - अपने शब्दों में भी कह सकते हैं – मुख्य बात है श्रद्धा और शान्ति-भावना।
- कोई पारम्परिक स्तुति / सूत्र
- आपके घर या स्थानीय परम्परा अनुसार: - “शान्तिकारम / शान्तिकरम् सूत्र” - या “शान्तिनाथ स्तवन / मण्डल विधान के श्लोक” - यदि आपको पूरा टेक्स्ट चाहिए, वही साइट पर संक्षिप्त मार्गदर्शन उपलब्ध है – और वहीं से आप अपने घर की परम्परा के अनुसार श्लोक चुन सकते हैं। - आप अधिक पढ़ सकते हैं यहाँ:
---
7. शान्ति-पाठ और विश्व-कल्याण भावना
- सर्व-जीव-कल्याण भावना
- मन में या शब्दों में: - “सभी जीवों की हिंसा रुके, रोग-दुःख दूर हों, सबको सम्यक् दर्शन-ज्ञान-चारित्र की प्राप्ति हो।”
- क्षमा-प्रार्थना (Kshamapana)
- “हे भगवन, इस विधान में मुझसे मन, वचन, काय से जो भी गलती हुई हो, जानकर या अनजाने, उसकी मैं क्षमा माँगता/माँगती हूँ।”
- शान्ति मंत्र / मंगल पाठ से समापन
- नवकार मंत्र - “खमेमि सव्वे जीवाणं…” (यदि परम्परा हो) - अंत में तीन बार “शान्ति, शान्ति, शान्ति” की भावना रखें – लेकिन ध्यान रहे: यह अन्तरिक शान्ति और सब जीवों के कल्याण के लिए हो, केवल सांसारिक लाभ के लिए नहीं।
---
8. दीपक, आरती और विसर्जन-भावना
- आरती (यदि आपके घर में प्रचलन हो)
- भगवान के सामने दीपक घुमाकर आरती गायन/पाठ करें
- मंडल / स्तापना विसर्जन-भावना
- मन में सोचें: - “जिनाचार्य की आज्ञा से, मैंने जो अल्प-पूजा की, वह भगवान को अर्पित करके अब मैं इसे समाप्त करता/करती हूँ। भगवान मेरे और सब जीवों का कल्याण करें।”
---
9. परम्परा (Digambar / Shwetambar) के भेद
- श्वेताम्बर परम्परा
- दिगम्बर परम्परा
घर पर, यदि आपको पूरी पुस्तिकानुसार करना हो, तो सबसे अच्छा है:
- अपने स्थानीय मन्दिर / पंडित / आचार्य-परम्परा से स्वीकृत “श्री शान्तिनाथ विधान” की पुस्तक लेकर
- उसी के अनुसार क्रम, मंत्र और समय-समय पर की जाने वाली निष्ठा करें।
---
यह क्रम एक सरल, सुरक्षित और शास्त्रीय भावना वाला गृह-विधान का ढांचा है। असली फल मन की शान्ति, अहिंसा, क्षमा और तत्त्व-चिन्तन से आता है – द्रव्य (सामान) से नहीं।