घंटाकर्ण महावीर के बारे में
घंटाकर्ण महावीर के बारे में संक्षिप्त और सरल जानकारी:
1. घंटाकर्ण महावीर कौन हैं?
- ये जैन धर्म के शासन-रक्षक देव (Yaksha / वीर) माने जाते हैं।
- विशेष रूप से श्वेतांबर परम्परा, खासकर तपा गच्छ में इनकी बहुत मान्यता है। ( jainknowledge.com)
- इन्हें ५२ वीरों (रक्षक देवों) में से एक माना जाता है। ( jainknowledge.com)
2. पूर्व जन्म की कथा (संक्षेप में) ( jainknowledge.com)
- पिछले जन्म में ये श्रीनगर के राजा तुंगभद्र (या महाबल) नाम के वीर क्षत्रिय राजा थे।
- वे तीर्थयात्रियों, कमजोरों व नगर के लोगों की रक्षा करते हुए डाकुओं से युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए।
- उनके इस परोपकार, बहादुरी और धर्म-रक्षा के फलस्वरूप वे घंटाकर्ण महावीर रूप में देव पद में प्रतिष्ठित हुए।
3. नाम “घंटाकर्ण” क्यों? ( jainknowledge.com)
- घंटा = घंटी, कर्ण = कान
- प्रचलित रूप में उनके कान या कर्णाभूषण (ear ornaments) घंटी जैसे बताए जाते हैं, इसलिए नाम पड़ा घंटाकर्ण।
- उन्हें धनुष, बाण, ढाल आदि शस्त्रों के साथ रक्षक रूप में दर्शाया जाता है।
4. उनका कार्य (महत्व) ( jainknowledge.com)
- जैन धर्म, धर्मानुयायियों और तीर्थों की रक्षा करना।
- भक्तों को डर, बाधाएँ, बीमारियाँ, विपत्ति, भूत-प्रेत जैसी नकारात्मक शक्तियों से बचाने वाले रक्षक देव के रूप में माने जाते हैं।
- उनका पूजन मोक्ष देने वाले तीर्थंकर की तरह नहीं, बल्कि रक्षा व बाधा-निवारण के लिए सहायक देव के रूप में होता है।
5. महुडी (गुजरात) में घंटाकर्ण महावीर ( jainknowledge.com)
- गुजरात के महुडी जैन तीर्थ पर घंटाकर्ण महावीर का बहुत प्रसिद्ध मंदिर है।
- यह तीर्थ आचार्य बुद्धिसागर सूरी ने सन् 1917 ई. में स्थापित किया।
- यहाँ मुख्य मूर्तिप्रतिष्ठा भगवान पद्मप्रभ स्वामी की है, और अलग मंदिर घंटाकर्ण महावीर का है।
- भक्त यहाँ सुखड़ी (घी, आटा, गुड़ की मिठाई) का प्रसाद चढ़ाते हैं और नियम है कि उसे मंदिर परिसर के बाहर नहीं ले जाते, वहीं बैठकर ग्रहण करते हैं।
- काली चौदस के दिन महुडी में विशेष हवन व दर्शन के लिए हज़ारों लोग पहुँचते हैं।
महुडी और घंटाकर्ण महावीर के बारे में और पढ़ने के लिए आप यहाँ देख सकते हैं:
6. दिगंबर–श्वेतांबर दृष्टि
- घंटाकर्ण महावीर की विशेष पूजा और विस्तृत परम्परा मुख्यतः श्वेतांबर समाज (विशेषकर तपा गच्छ) में पायी जाती है। ( jainknowledge.com)
- दिगंबर परम्परा में इनकी वैसी संगठित और मुख्य धारा वाली उपासना नहीं मिलती; वहाँ ध्यान और आराधना का मुख्य केंद्र तीर्थंकर भगवान और सिद्ध परमेष्ठी ही रहते हैं।
7. साधना व यंत्र
- घंटाकर्ण महावीर से जुड़े मंत्र–स्तोत्र और यंत्र भी प्रचलित हैं, जिनका उपयोग मुख्यतः रक्षा और बाधा-निवारण की भावना से किया जाता है। ( jainknowledge.com)
यदि आप चाहें तो मैं अगली बार
- घंटाकर्ण महावीर से जुड़ा कोई सरल स्तोत्र/मंत्र,
- या महुडी में होने वाली पूजा-विधि (सुखड़ी प्रसाद, हवन आदि)