धर्म ध्यान करते आर्तध्यान करने वाले मुनि
आपने जो वाक्य लिखा है – “धर्म ध्यान करते आर्तध्यान करने वाले मुनि” – उसका भाव यह है कि बाहर से तो मुनि “धर्म‑ध्यान” करते दिखाई दें, पर भीतर से उनका वास्तविक ध्यान “आर्त‑ध्यान” में चल रहा हो।
जैन दर्शन के अनुसार:
1. चार प्रकार के ध्यान
शास्त्रों में चार ध्यान बताए हैं – 1) आर्त ध्यान (Artadhyan) – दुख, पीड़ा, चिंता, इच्छाएँ, पछतावा आदि में डूबा हुआ ध्यान 2) रौद्र ध्यान (Raudradhyan) – क्रोध, हिंसा, बदला, कपट, लोभ आदि पाप‑भावों वाला ध्यान 3) धर्म ध्यान (Dharmadhyan) – शास्त्र, तीर्थंकर, गुरु, आत्मा, पाप‑पुण्य, कर्म‑निर्जरा आदि शुभ विषयों का शांत और संयमित चिंतन 4) शुक्ल ध्यान (Shukladhyan) – अत्यंत शुद्ध, निष्कषाय, केवल आत्मा में लीन सर्वोच्च ध्यानआर्त और रौद्र – अशुभ ध्यान हैं, धर्म और शुक्ल – शुभ / शुद्ध ध्यान हैं।
2. “धर्म‑ध्यान करते हुए भी आर्त‑ध्यान” का अर्थ
मुनि (या कोई भी साधक) बाहर से:- स्वाध्याय कर रहा है
- पूजा, प्रतिक्रमण, सामायिक में बैठा है
- मौन, आसन, नियम सब सही हैं
लेकिन भीतर:
- शरीर की पीड़ा, बीमारी को लेकर व्याकुल हो रहा हो
- मान‑अपमान, आदर‑अनादर की चिंता कर रहा हो
- सुविधाओं, भोजन, वस्त्र आदि के बारे में खिन्नता या लालसा में डूबा हो
- “मुझे यह क्यों हुआ, मेरे साथ ही ऐसा क्यों?” जैसे दुःख‑विचार चला रहे हों
तो बाहरी दृष्टि से वह “धर्म‑ध्यान” जैसा लगता है, पर अंतरंग भाव “आर्त‑ध्यान” के हैं। जैन शास्त्रों में स्पष्ट है कि “ध्यान” का निर्णय बाहरी क्रिया से नहीं, अंतरंग भाव से होता है।
3. मुनि के लिए क्या अपेक्षित है?
सच्चा मुनि‑धर्म यह है कि:- कष्ट, बीमारी, तिरस्कार आदि में भी समता बनाए
- राग‑द्वेष छोड़कर आत्मा, पंचपरमेष्ठी, तत्त्व, कर्म‑निर्जरा आदि का शांत चिंतन करे
- अहिंसा, अपरिग्रह, क्षमा, मार्दव, संयम आदि गुणों पर मन लगाए
तभी उसका ध्यान “धर्म‑ध्यान” कहलाता है; वरना वही मुनि‑देह, मुनि‑वेश में रहकर भी यदि चिंता‑शोक‑व्याकुलता में डूबा है, तो वह आर्त‑ध्यान का ही अधिकारी बनता है।
4. साधक के लिए सीख
- केवल रूप, वेश, क्रिया से संतोष न हो
- मुख्य बात है – अंदर कौन‑सा भाव चल रहा है?
- गृहस्थ हो या मुनि –
इसलिए साधना का लक्ष्य यह होना चाहिए कि:
- बाहरी “धर्म‑कर्म” के साथ‑साथ
- भीतर भी शुद्ध, शांत, समभाव‑युक्त धर्म‑ध्यान बना रहे,