जाति नामकर्म explain
जाति नामकर्म – सरल भाषा में समझिए
- नामकर्म क्या है?
आठ मुख्य कर्मों में से एक है नामकर्म (शरीर बनाने वाला कर्म). – इसके उदय से हमें कैसा शरीर, रूप, गन्ध, स्पर्श, गति, जाति आदि मिलेगा – यह सब तय होता है।
- जाति नामकर्म क्या करता है?
जाति नामकर्म नामकर्म की 42 प्रकृतियों में से एक विशेष प्रकृति है। इसका काम है – > “इस जीव को किस जाति / वर्ग में जन्म मिलेगा और उस जाति के जैसे दूसरे जीवों से उसकी समानता कैसी होगी, यह तय करना।”
यानी, – हम मनुष्य, तिर्यंच (पशु‑पक्षी, कीट आदि), देव या नरकजीवी किस भाव में जाएँगे, – और उस भाव में हमारी जाति / वर्ग (जैसे एकेन्द्रिय, द्वेन्द्रिय आदि) क्या होगी – यह जाति नामकर्म के उदय से ही होता है।
- जाति नामकर्म से बनने वाली मुख्य जातियाँ
साधारण रूप से दो स्तर पर समझ सकते हैं:
(क) गति के अनुसार - देव‑जाति - मनुष्य‑जाति - तिर्यंच‑जाति - नरक‑जाति
(ख) इन्द्रियों के अनुसार (विशेष करके तिर्यंच आदि में) – एकेन्द्रिय जाति नामकर्म → एक इन्द्रिय वाले जीव (जैसे वनस्पति, पृथ्वी‑काय, जल‑काय आदि) – द्वेन्द्रिय जाति नामकर्म → दो इन्द्रिय वाले जीव – त्रेन्द्रिय जाति नामकर्म → तीन इन्द्रिय वाले जीव – चतुरेन्द्रिय जाति नामकर्म → चार इन्द्रिय वाले जीव – पंचेन्द्रिय जाति नामकर्म → पाँच इन्द्रिय वाले जीव (जिनमें मनुष्य, बहुत से पशु‑पक्षी आदि आते हैं)
- “समानता” कैसे समझें?
– सभी चींटियों का एक जैसा छोटा शरीर, – सभी गाय‑गाय जैसे दिखना, – एक तरह के पेड़ों का मिलते‑जुलते रूप‑स्वभाव वाला होना – यह सब उसी जाति नामकर्म के कारण है। अगर जाति नामकर्म न हो, तो – “खटमल–खटमल जैसा, बिच्छू–बिच्छू जैसा” एक जैसा रूप‑स्वभाव बन ही नहीं सकता।
- संक्षेप में
- नामकर्म = शरीर व रूप‑रचना तय करने वाला कर्म। - जाति नामकर्म = – हम किस लोक‑जाति (देव, मनुष्य, तिर्यंच, नरक) में जन्म लें, – और उस जाति के अन्य जीवों जैसे एक‑से रूप और गुण हमें मिलें – यह निर्धारित करता है।
यही है जाति नामकर्म का सरल अर्थ व काम।