18papasthanak in hindi
18 पापस्थानक (पापकर्म के 18 कारण) – संक्षेप में हिन्दी में:
- प्राणातिपात (हिंसा)
किसी भी जीव के प्राण को कष्ट देना या नष्ट करना – विचार, वचन या शरीर से।
- मृषावाद (झूठ बोलना)
स्वार्थ या कपट से असत्य बोलना, किसी को धोखे में रखना।
- अदत्तादान (चोरी)
जो वस्तु अपनी नहीं है, बिना अधिकार या अनुमति के लेना।
- मैथुन (असंयम / कुशील)
इन्द्रिय-भोगों, विशेषकर काम-विकार में आसक्त होना, ब्रह्मचर्य का भंग।
- परिग्रह (संग्रह / लालच से अधिक रखना)
आवश्यकता से ज़्यादा वस्तु, धन, सम्बन्ध आदि का लोभ से संग्रह करना।
- क्रोध
मन में जलन, चिड़चिड़ापन, बदला लेने की भावना रखना।
- मान (अहंकार / घमण्ड)
“मैं ही बड़ा हूँ” – ऐसा गर्व, दूसरों को छोटा समझना।
- माया (कपट / धोखा)
भीतर कुछ और, बाहर कुछ और दिखाना; छल-कपट से काम लेना।
- लोभ (लालच)
धन, पद, स्वाद, सुख आदि की अति चाह; जितना है उतना कभी पर्याप्त न लगे।
- राग (आसक्ति / ज़्यादा लगाव)
व्यक्ति, वस्तु, स्थान आदि से चिपक जाना, छोड़ न पाना।
- द्वेष (घृणा / वैरभाव)
किसी के प्रति नफ़रत, बुराई चाहना, बदले की भावना रखना।
- कलह (झगड़ा)
लड़ाई-झगड़ा, तकरार, शांति भंग करने वाली वृत्ति।
- अभियाख्यान (झूठा दोषारोपण)
जो दोष नहीं है, वह किसी पर लगा देना; झूठा आरोप।
- पैशुन्य (चुगली / चुगलीभरी बात)
एक की बात दूसरे के सामने इस तरह कहना कि उनके बीच फूट पड़े।
- पर-परिवाद (पीठ पीछे निंदा)
सामने मीठा, पीछे उसकी बुराई करना, बदनाम करना।
- रति–अरति (अति प्रसन्नता और अति खिन्नता)
अच्छे में इतना डूब जाना कि धर्म भूल जाएँ, या बुरे में इतना दुखी होना कि सम्यक सोच ही न रहे।
- माया‑मृषावाद (कपटयुक्त झूठ)
साधारण झूठ से भी आगे – बहुत सोच-समझकर, योजना बनाकर धोखा देना।
- मिथ्यात्व (कुसंयक दर्शन / गलत श्रद्धा)
आत्मा, कर्म, पुनर्जन्म, अहिंसा आदि सत्य सिद्धान्तों को न मानना या उल्टा मानना।
ये 18 पापस्थानक प्रायः प्रतिक्रमण में स्मरण कर के, हम उनसे बचने का संकल्प करते हैं, क्योंकि ये सब मिलकर भारी पापकर्म बाँधते हैं और आत्मा की शुद्धि में बाधा बनते हैं।