कितने सगरो पंप की स्थिति वाले देव ना पक्ष में सांस लेते हैं
जैन धर्म के अनुसार, "सगरो पंप की स्थिति" (सगरोपम्प स्थितिवान) देवों का वर्णन देव लोक (स्वर्ग) के संदर्भ में मिलता है। देवों के श्वास (सांस) लेने के संबंध में शास्त्रों में उल्लेख है कि:
- नारक (नरक के जीव) और तिर्यंच (पशु आदि) प्राणियों की तरह देव सांस नहीं लेते।
- देवों की आयु, शरीर, और भोग, कर्म के अनुसार निर्धारित होते हैं।
- अधिकांश देवों के लिए सांस लेना (इन्द्रियों के माध्यम से प्राणवायु ग्रहण करना) नहीं होता।
- "ना-पक्ष" (ना = नहीं) का अर्थ है कि वे सांस नहीं लेते।
सगरोपम्प स्थितिवान देवों की स्थिति में भी यही बात लागू होती है। जैन आगमों के अनुसार, स्वर्ग के सभी देव — जिनमें सगरोपम्प स्थितिवान देव भी शामिल हैं — सांस नहीं लेते। उनके शरीर वैकृतिक (विशिष्ट प्रकार के) होते हैं, जिनमें सांस लेने, पसीना आने आदि जैसी मानव जैसी शारीरिक क्रियाएँ नहीं होतीं।
निष्कर्ष: जैन शास्त्रों के अनुसार, सगरो पंप की स्थिति वाले देव 'ना-पक्ष' में आते हैं अर्थात वे सांस नहीं लेते हैं।
संदर्भ:
- तत्त्वार्थ सूत्र (Tattvartha Sutra) — अध्याय 4, सूत्र 12, 13
- जैन विश्वकोश, "देव" और "सगरोपम्प" संबंधी प्रविष्टियाँ