Aart dhyan ka karan
जैन दर्शन में आर्त ध्यान (Ārtta Dhyan) अशुभ ध्यान है – ऐसा मानसिक चिंतन जो दुःख, चिन्ता और क्लेश से भरा हो।
आर्त ध्यान के प्रमुख कारण (4 प्रकार)
- अनिष्ट‑संयोग आर्त ध्यान
- जब हम किसी अप्रिय स्थिति, व्यक्ति या परिस्थिति में फँस जाते हैं - और बार‑बार उसी दुःखद स्थिति के बारे में सोचते रहते हैं। - जैसे: नौकरी में अपमान हुआ, घर में झगड़ा हुआ – और मन पूरे दिन उसी में डूबा रहे।
- इष्ट‑वियोग आर्त ध्यान
- जब जो चीज, व्यक्ति या स्थिति हमें प्रिय थी वह छिन जाती है - और हम उसी के वियोग (बिछोह) का दुख मन में बार‑बार दोहराते रहते हैं। - जैसे: धन की हानि, अपने किसी प्रियजन से बिछड़ना, सुख‑सुविधा छिन जाना इत्यादि।
- रोग‑चिन्ता आर्त ध्यान
- जब अपने शरीर के रोग, दर्द, बीमारी को लेकर लगातार चिन्ता, डर और दुख में डूबे रहें। - जैसे: “मुझे ये बीमारी क्यों हो गयी?”, “कहीं मैं मर न जाऊँ”, “अब मेरा क्या होगा?” – इस प्रकार की चिंता में लगा रहना।
- निदान आर्त ध्यान
- दुर्लभ या कठिन प्राप्त होने वाली वस्तु, पद, सुख, संबंध आदि को पाने की अत्यधिक कामना और लालसा में पड़े रहना। - जैसे: “कभी न कभी मैं बहुत बड़ा अमीर बन जाऊँगा, किसी भी तरह ये पद मिल ही जाना चाहिए” – और मन दिन‑रात उसी मोह में लगा रहे।
इन चारों प्रकार में मन वर्तमान क्षण में आत्मा पर नहीं, बल्कि बाहरी दुःख, कमी, हानि या लालसा पर लगा रहता है – यही आर्त ध्यान का कारण है और यही बन्ध व संसार की जड़ है।
और सरल रूप में:
- जो हो चुका है उसके दुख में पड़े रहना
- जो छिन गया है उसके शोक में डूबे रहना
- जो मिला है वह न छिन जाए इसकी चिन्ता करना
- जो मिला नहीं उसे पाने की जिद में फँसे रहना