नवकार महामंत्र उल्टा कैसे बोला जाता है
नवकार महामंत्र उल्टा बोलने की कोई परंपरा जैन धर्म में नहीं है और ऐसा करना उचित भी नहीं माना जाता।
1. नवकार हमेशा “सीधे” ही बोला जाता है
मूल प्राकृत पाठ इस प्रकार है:णमो अरिहंताणं। णमो सिद्धाणं। णमो आयरियाणं। णमो उवज्झायाणं। णमो लोए सव्वसाहूणं॥ एसो पंच णमोक्कारो, सव्व पावप्पणासणो। मंगलाणं च सव्वेसिं, पढमं हवइ मंगलं॥
इसी क्रम में – अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, साधु – को नमस्कार किया जाता है। इसी को पंच परमेष्ठी क्रम कहते हैं। इसे बदलना या उल्टा करना हीनता मानी जाती है।
2. “उल्टा मंत्र” की धारणा कहाँ से आती है?
कुछ जगह सामान्य तांत्रिक परंपराओं में “उल्टा मंत्र” जैसी बातें सुनने को मिलती हैं, लेकिन जैन धर्म में, खासकर नवकार महामंत्र के लिए, ऐसा कोई आध्यात्मिक या शास्त्रीय समर्थन नहीं है।- यह मंत्र सभी पापों का नाश करने वाला, सर्वोत्तम मंगल माना गया है।
- इसे खेल‑खेल में, प्रयोग के रूप में, या उल्टा‑सीधा बोलना – यह श्रद्धा के विरुद्ध है।
3. जैन दृष्टि से सही आचरण
- नवकार हमेशा आदर, एकाग्रता और सही क्रम से ही बोलें।
- उल्टा बोलना, शब्द बदलना, मज़ाक में बोलना – सब अमान्य और अश्रद्धा के रूप में देखा जाता है।
इसलिए: नवकार महामंत्र को केवल उसी प्रकार बोलें, जैसा आचार्यों ने दिया है; “उल्टा नवकार” जैन धर्म में न सिखाया गया है, न मान्य है।
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