Lok no tyag pachhkhan
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“Lok no tyag pachhkhan” (लोक नो त्याग पछ्खण / लोक का त्याग प्रत्याख्यान)
यह कोई एक निश्चित सार्वत्रिक सूत्र नहीं, बल्कि एक प्रत्याख्यान (pachhkhan) है – जिसमें साधक “लोकसुख, लोकमान, लोकव्यवहार” आदि का त्याग करने का निश्चय करता है।
सार भाव (अर्थ) बहुत सरल है:
- मैं संसार के लोक–मान, प्रशंसा, बदनामी, रिश्ते–नाते, देह–सुख आदि से आसक्ति नहीं रखूँगा।
- मेरा आश्रय केवल आत्मा और धर्ममार्ग है, न कि दुनिया की राय और सुख–साधन।
- लोक की अपेक्षा, मैं मोक्षमार्ग को प्रधान मानकर चलने का संकल्प करता हूँ।
अलग–अलग गच्छ/संप्रदाय, स्थान और भाषा के अनुसार इसके शब्दों में अंतर होता है, इसलिए बिना प्रमाण के कोई एक “मूल पाठ” देना ठीक नहीं होगा।
अगर आपको यह प्रतिज्ञा लेना हो, तो आप सरल भाव से मन में ऐसा निश्चय कर सकते हैं:
> “मैं लोक मान–अपमान, देह और विषयों के आकर्षण का त्याग कर, > केवल आत्मकल्याण और मोक्षमार्ग को ही अपना लक्ष्य मानता/मानती हूँ।”
यही “लोक त्याग” का मुख्य आध्यात्मिक अर्थ है।