Bhaktamar 6 sholk
Bhaktamar Stotra – Shlok 6 (विद्या / वाणी से संबंधित गाथा)
मूल श्लोक (Sanskrit):
अल्पश्रुतं श्रुतवतां परिहासधाम त्वद्भक्तिरेव मुखरी कुरुते बलान्माम् । यत् कोकिलः किल मधौ मधुरं विरौति तच्चाम्रचारु-कलिका-निकरैक-हेतुः ॥ ६ ॥
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सरल हिन्दी अर्थ (बहुत सरल भाषा में):
हे प्रभु! मैं बहुत कम पढ़ा‑लिखा हूँ, विद्वानों के सामने तो मेरा ज्ञान मज़ाक जैसा है। लेकिन आपकी भक्ति ही मेरे जैसे अल्पज्ञानी को भी बोलने लायक बना देती है।
जैसे कोयल वसंत ऋतु में बहुत मीठा गाती है, और उसके मधुर स्वर का असली कारण आम के सुंदर कोमल कलियों के समूह होते हैं, वैसे ही मेरी वाणी का सौंदर्य यदि कहीं है, तो वह केवल आपकी भक्ति के कारण है, न कि मेरे ज्ञान के कारण।
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आध्यात्मिक भाव:
- खुद को “अल्पश्रुत” (कम ज्ञान वाला) मानकर नम्रता रखना।
- यह समझना कि असली शक्ति हमारे अहंकार या विद्या से नहीं, भगवान की भक्ति से आती है।
- जो भी अच्छा बोल पाते हैं, वह भी अरिहंत प्रभु की कृपा और उनकी भक्ति का ही परिणाम है।
व्यवहारिक मान्यता: परंपरागत रूप से यह 6वीं गाथा
- विद्या, स्मरण‑शक्ति और वाणी की स्पष्टता के लिए
भक्तामर के श्लोकों के महत्व पर एक संक्षिप्त चर्चा यहाँ देख सकते हैं: