Asthang nimit shashtra
“अष्टाङ्ग निमित्त शास्त्र” का अर्थ है – निमित्त (शुभ‑अशुभ संकेत) जानने की वह विद्या, जिसमें आठ प्रकार के निमित्त बताए गए हैं। इसे जैन आगम‑परम्परा में “अष्टाङ्ग महा‑निमित्त” भी कहा जाता है।
जैन ग्रंथों के अनुसार आठ निमित्त मोटे तौर पर ये माने गए हैं:
- अंतरिक्ष निमित्त –
आकाश में होने वाले संकेत (जैसे ग्रह‑नक्षत्रों की चाल, उल्कापात, इन्द्रधनुष आदि से भविष्य का अनुमान)
- भौम / भूमि निमित्त –
धरती, भूमि, स्थान से जुड़े संकेत (जैसे भूमि का फटना, कम्पन, भूमि की बनावट, रंग‑रूप आदि)
- अंग निमित्त –
शरीर के अंगों के संकेत (किस अंग में कँपन, फड़कन, अचानक पीड़ा या चिन्ह आदि)
- स्वर निमित्त –
शब्द और आवाज से मिलने वाले संकेत (अचानक कोई शब्द सुनना, पास‑दूर से किसी की आवाज, पक्षियों‑जानवरों की ध्वनि आदि)
- व्यंजन / व्यंजन‑लक्षण निमित्त –
शरीर पर बने स्थायी चिन्ह (जैसे मस्सा, तिल, रेखाएँ आदि; इनके आधार पर स्वभाव या भाग्य का अनुमान)
- लक्षण निमित्त –
विशेष शुभ‑अशुभ चिह्न (जैसे पद्म, चक्र आदि आकृतियाँ – शरीर, भूमि या कहीं भी दिखाई देने पर)
- छिन्न / भेद / विभाजन निमित्त –
किसी वस्तु का कटना, टूटना, फटना, रेखाओं/विभाजनों का बनना (जैसे वस्त्र का अचानक फट जाना, हथियार का टूटना, भूमि पर अनोखी दरारें आदि)
- स्वप्न निमित्त –
सपनों के आधार पर भविष्य का अनुमान (शुभ‑अशुभ स्वप्नों के परिणाम जैन ग्रन्थों में विस्तार से बताए गए हैं)
जैन दृष्टि से इसका महत्व
- पुराने जैन ग्रंथों में वर्णन है कि कुछ आचार्य और ऋषि “अष्टाङ्ग महा‑निमित्त ज्ञान” में पारंगत थे, जो इन आठों निमित्तों से होने वाले शुभ‑अशुभ परिणाम जान सकते थे।
- लेकिन मुख्य जैन दर्शन में मोक्ष के लिए असली कारण “अपने कर्म और पुरुषार्थ” हैं, निमित्त केवल बाहरी सहायक बात मानी जाती है।
- साधु के आहार आदि में, इन निमित्तों को देखकर निर्णय लेना (यह शुभ है या अशुभ) – यह “आहार के दोषों” में गिना गया है; यानी साधु को ऐसी निमित्त‑चिन्ता में नहीं फँसना चाहिए, उसे समता और वैराग्य से रहना है।
- श्रावक के लिए भी शिक्षा यही है कि निमित्त‑शास्त्र को चमत्कार और भाग्य‑ज्योतिष की तरह पकड़ कर न बैठे, बल्कि उसे इतिहास‑परम्परा की विद्या मानें; मुख्य ध्यान–
संक्षेप में: अष्टाङ्ग निमित्त शास्त्र = आठ प्रकार के शुभ‑अशुभ संकेतों का जैन‑परम्परागत विज्ञान; पर जैन धर्म का असली ज़ोर हमेशा नियम, संयम और आत्म‑पुरुषार्थ पर ही है, न कि केवल निमित्त‑भविष्य‑वाणी पर।