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  • लक्षण निमित्त –detail me bataiye kon kon se lakshan ka matlab kya hota hai
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    लक्षण निमित्त –detail me bataiye kon kon se lakshan ka matlab kya hota hai

    5 months ago 88

    सबसे पहले दो शब्द समझ लें – लक्षण और निमित्त

    ---

    1. “लक्षण” का अर्थ क्या है?

    जैन दर्शन में लक्षण = किसी पदार्थ (द्रव्य) की पहचान कराने वाला उसका अपना स्वभाव / गुण

    • जिस चीज़ के बिना वह द्रव्य सोचा ही नहीं जा सकता – वही उसका लक्षण है।
    - जैसे – - पुद्गल (पदार्थ) का लक्षण – रूप, रस, गंध, स्पर्श - जीव (आत्मा) का लक्षण – उपयोग (ज्ञान‑दर्शन की शक्ति)

    सरल भाषा में: > जो बात देखकर हम निश्चित कह सकें – “यह वही चीज़ है” – वही उसका लक्षण है।

    ---

    2. “निमित्त” का अर्थ क्या है?

    निमित्त = सहायक कारण / बाहरी कारण

    • कोई भी परिवर्तन, फल, परिणाम – दो चीज़ों से होता है:
    1. उपादान कारण – अंदर की असली शक्ति (द्रव्य का अपना स्वभाव) 2. निमित्त कारण – बाहर से मिला सहारा

    उदाहरण:

    • दूध से दही बनती है
    - दूध = उपादान कारण (मुख्य पदार्थ) - जामन / दही का छोटा भाग, ताप आदि = निमित्त - असली रूपांतरण की शक्ति दूध में ही है, जामन केवल सहायक कारण है।

    जैन दर्शन में बार‑बार आता शब्द है – “उपादान‑निमित्त” मतलब – > वस्तु अपने स्वभाव से बदलती है, लेकिन बाहर से मिले निमित्त के साथ।

    ---

    3. “तीन लक्षण” – उत्पाद, व्यय, ध्रौव्य

    जैन सिद्धांत में हर द्रव्य (पदार्थ) के तीन मुख्य लक्षण बताए जाते हैं:

    सूत्र का रूप: > “उत्पाद‑व्यय‑ध्रौव्य‑युक्तं सत्” > जो चीज़ हर क्षण उत्पन्न भी हो, नष्ट भी हो और फिर भी बनी भी रहे – वही सत् (सच्चा अस्तित्व / द्रव्य) है।

    अब तीनों को बहुत सरल शब्दों में:

    (1) उत्पाद (उत्पत्ति, नया होना)

    • उत्पाद = नई अवस्था / नया रूप पैदा होना
    • हर क्षण द्रव्य में कुछ‑न‑कुछ नया रूप (पर्याय) आता है।

    उदाहरण:

    • पौधे में नई पत्ती निकलना
    • आपके शरीर में नई कोशिकाएँ बनना
    • आपके मन में नया विचार आना

    ये सब उत्पाद के उदाहरण हैं।

    ---

    (2) व्यय (नाश, पुराना मिटना)

    • व्यय = पुरानी अवस्था / पुराना रूप खत्म होना
    • जो नया बन रहा है, उसके साथ‑साथ पुराना रूप हट भी रहा है।

    उदाहरण:

    • वही पौधा – पुरानी पत्ती सूखकर गिर जाती है
    • शरीर की पुरानी कोशिकाएँ मरती रहती हैं
    • मन का पुराना विचार मिटकर नया विचार आता है

    ये सब व्यय हैं।

    ---

    (3) ध्रौव्य (स्थिरता, स्थायी सत्ता)

    • ध्रौव्य = बदलते रूपों के बीच जो “वह‑वही” चीज़ बनी रहती है, वह स्थायी द्रव्य
    • रूप बदलता है, पर द्रव्य (substance) बना रहता है।

    उदाहरण:

    • पौधे में नई‑पुरानी पत्तियाँ आती‑जाती हैं, पर “पौधा” वही रहता है – यह ध्रौव्य।
    • आपका शरीर हर समय बदल रहा है, पर “आपकी आत्मा” वही रहती है – यह ध्रौव्य।

    इसे ऐसे समझें: > नदी का पानी हर क्षण बदल रहा है (उत्पाद‑व्यय), > फिर भी हम उसे “वही नदी” कहते हैं – यह नदी की ध्रौव्य‑भावना है।

    ---

    4. “लक्षण‑निमित्त” शब्द एक साथ क्यों बोले जाते हैं?

    ज्ञान की दृष्टि से एक शब्द आता है – “लक्षण‑निमित्त‑ज्ञान” मतलब:

    • लक्षण से ज्ञान – किसी वस्तु के चिन्ह / स्वभाव देखकर
    - धुआँ देखकर आग का अनुमान – धुआँ = लक्षण
    • निमित्त से ज्ञान – किसी कारण / सहायक को देखकर
    - काले बादल, तेज हवा देखकर बारिश का अनुमान – बादल = निमित्त

    इसलिए “लक्षण‑निमित्त” – दोनों मिलकर भी प्रयोग होता है: > किसी वस्तु को उसके लक्षण (पहचान) और निमित्त (कारण) से जानना।

    ---

    संक्षेप में

    1. लक्षण –

    - द्रव्य की अपनी पहचान कराने वाला गुण / स्वभाव

    1. निमित्त –

    - बाहर से मिलने वाला सहायक कारण

    1. हर द्रव्य के तीन मुख्य लक्षण –

    - उत्पाद – नया रूप बनना - व्यय – पुराना रूप मिटना - ध्रौव्य – इनके बीच द्रव्य की स्थायी सत्ता बनी रहना

    यही “लक्षण‑निमित्त” और “कौन‑कौन से लक्षण” का मूल जैन सिद्धांत है।

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