Malu caste history
“Malu” कोई अलग धर्म नहीं, बल्कि एक जैन व्यापारी समुदाय / गोत्र का नाम है, जो मुख्य रूप से ओसवाल जैनों में पाया जाता है।
संक्षेप में इतिहास (समुदाय की परम्परागत कथा के अनुसार):
- मालू ओसवाल जैनों का एक उप–गोत्र माना जाता है।
- यह दागा गोत्र का ही एक उप–गोत्र (sub‑gotra) बताया जाता है। ( oswals.net)
- कथा के अनुसार पहले ये लोग महेश्वरी राठी (हिन्दू वैश्य/व्यापारी) थे।
- राठी मालदेव (या मालदावे) नाम के एक महेश्वरी मंत्री रतनपुर राज्य में राजा के दरबार में थे। उनके पुत्र को लकवे / गंभीर रोग (जैसे hemiplegia/hemophilia) था। ( oswals.net)
- उस समय वहाँ आचार्य जिनदत्त सूरी (श्वेताम्बर परम्परा के महान आचार्य) पधारे।
- मंत्री ने विनती की, आचार्य ने औषधि और मंत्र से बालक को रोग‑मुक्त किया।
- इस चमत्कार से प्रभावित होकर मालदेव ने जैन धर्म स्वीकार किया और ओसवाल जैन समुदाय में शामिल हुए।
- उनके वंश / परिवार को आगे चल कर “मालू” नाम से जाना जाने लगा; इसी से मालू गोत्र / मालू जैन की परम्परा मानी जाती है। ( oswals.net)
जैन दृष्टि से महत्वपूर्ण बिंदु:
- ये कथा समुदाय–इतिहास (कुल–परम्परा) से आती है, अगम या मूल श्रुत में ऐसी जाति–विशेष कथाएँ नहीं मिलतीं।
- यह विवरण मुख्यतः श्वेताम्बर ओसवाल परम्परा में प्रचलित है; दिगम्बर ग्रन्थ सामान्यतः इस प्रकार के गोत्र‑विशेष इतिहास को विस्तार से नहीं लेते।
- आज “मालू जैन” प्रायः राजस्थान–गुजरात आदि के ओसवाल जैन व्यापारी परिवारों के रूप में जाने जाते हैं, जो अन्य ओसवालों की ही तरह जैन आचार–विचार, व्रत, पूजा आदि का पालन करते हैं।
यदि आप बहुत संक्षेप में याद रखना चाहें:
> मालू = ओसवाल जैनों का एक गोत्र, जिसकी परम्परागत उत्पत्ति एक महेश्वरी मंत्री मालदेव के जैन धर्म ग्रहण करने से मानी जाती है।