aacharya ke 36 gun
आचार्य के 36 गुण – सरल रूप में
जैन धर्म में आचार्य परमेष्ठी के कुल 36 मूल गुण बताए गए हैं। इन्हें इस प्रकार गिना जाता है:
- 5 महाव्रत
- अहिंसा महाव्रत - सत्य महाव्रत - अचौर्य (चोरी न करना) महाव्रत - ब्रह्मचर्य महाव्रत - अपरिग्रह महाव्रत
- 5 आचार (शुद्ध आचरण के नियम)
(ग्रन्थों में इन्हें अलग‑अलग तरह से गिना गया है, संक्षेप में) - उत्तम आहार आचार (भोजन सम्बन्धी शुद्धता) - इन्द्रिय‑निग्रह सम्बंधी आचार - व्यवहार की शुद्धता - विहार (चलना‑फिरना) की शुद्धता - आम्वन / उपभोग की मर्यादा आदि
- 5 इन्द्रियाँ जीती हुई (इन्द्रिय‑विजय)
- रूप (देखना) पर संयम - रस (स्वाद) पर संयम - गन्ध (सुगन्ध‑दुर्गन्ध) पर संयम - स्पर्श (स्पर्शानुभूति) पर संयम - शब्द (आवाज़) पर संयम
- 4 कषाय जीते हुए
- क्रोध जीता हुआ - मान (अहंकार) जीता हुआ - माया (कपट) जीती हुई - लोभ (लालच) जीता हुआ
- नव‑वाड़ सहित शुद्ध ब्रह्मचर्य (9 प्रकार से पूर्ण ब्रह्मचर्य)
मतलब – शरीर, मन, वचन, दृष्टि, संकल्प, स्मरण आदि सभी रूपों से स्त्री‑पुरुष विषयों से पूर्ण विरति; केवल देह से नहीं, भावों और विचारों से भी पूर्ण शुद्धि। (इसे 9 प्रकार से गिना जाता है, इसीलिए “नव‑वाड़”.)
- 5 समितियाँ (सावधानियाँ)
- ईर्या समिति – चलते समय अहिंसा की सावधानी - भाषण (भाषा) समिति – बोलने में सावधानी - एषण समिति – आहार आदि प्राप्त करने में सावधानी - आदान‑निक्षेप समिति – वस्तु उठाने‑रखने में सावधानी - उत्सर्ग समिति – मल‑मूत्र त्याग आदि में सावधानी
- 3 गुप्तियाँ (अन्तरंग संयम)
- काय‑गुप्ति – शरीर को वश में रखना - वचन‑गुप्ति – वाणी को वश में रखना - मनो‑गुप्ति – मन / विचारों को वश में रखना
अब इनका योग:
- 5 महाव्रत
- 5 आचार
- 5 इन्द्रिय‑विजय
- 4 कषाय‑विजय
- 9 वाड़ वाला शुद्ध ब्रह्मचर्य
- 5 समितियाँ
- 3 गुप्तियाँ
कुल = 5 + 5 + 5 + 4 + 9 + 5 + 3 = 36 गुण
इन्हीं को “आचार्य के 36 गुण” कहा जाता है। इन गुणों से युक्त साधु ही जैन परम्परा में आचार्य‑पद के योग्य माने जाते हैं।