Bhogi ko dekhkar yogi kon vyakti bane
यह प्रश्न “भोगी को देखकर योगी कौन व्यक्ति बने” जैन धर्म के सन्दर्भ में समझा जा सकता है। जैन दर्शन के अनुसार, “भोगी” वह है जो इन्द्रियों के भोग-विलास में लिप्त रहता है, जबकि “योगी” वह है जो आत्म-संयम, तप, और साधना के मार्ग पर चलता है।
जैन धर्म में अनेक महापुरुषों के जीवन में यह उदाहरण मिलता है। उदाहरण के लिए, भगवान महावीर स्वामी स्वयं एक राजकुमार (भोगी जीवन) थे, लेकिन संसार के भोगों को त्यागकर तपस्वी (योगी) बने।
इसका तात्पर्य यह है: जो व्यक्ति भोग-विलास में रहकर भी संसार की क्षणभंगुरता को समझता है और आत्मकल्याण के लिए संयम, त्याग, और साधना का मार्ग अपनाता है, वही “योगी” बन जाता है। ऐसे व्यक्ति के जीवन में परिवर्तन का कारण भोग-विलास का अनुभव होना भी हो सकता है, जिससे उसे वैराग्य की भावना जागृत होती है।
संक्षेप में: भोगी को देखकर योगी वही व्यक्ति बनता है, जिसमें वैराग्य की भावना जागृत हो और जो आत्मकल्याण के लिए संयम, तप और साधना का मार्ग अपनाए — जैसा कि जैन धर्म में बताया गया है।