कल्पसूत्र में वृषभदेव के कौन से नाम आते हैं
कल्पसूत्र (श्वेताम्बर आगम) के मूल प्राकृत ग्रन्थ में प्रथम तीर्थंकर के लिए मुख्य रूप से ये नाम/उपनाम मिलते हैं:
- रिसभ / ऋषभ
- यही मूल प्राकृत नाम है, जिसको संस्कृत में “ऋषभदेव” या “ऋषभनाथ” कहा जाता है। - कल्पसूत्र में उनके जन्म, दीक्षा, केवलज्ञान आदि प्रसंगों में “रिसभ” नाम से ही उल्लेख आता है।
- प्रथम तीर्थंकर / आद्य तीर्थंकर
- अर्थ– जो सबसे पहले तीर्थ की स्थापना करने वाले। - यह उपाधि के रूप में आती है; बाद के संस्कृत–हिन्दी अनुवादों में इसे “आदिनाथ” के रूप में भी व्यक्त किया जाता है।
- वंश/परिवार के आधार पर संबोधन
- जैसे – नाभि–पुत्र, मरुदेवी–पुत्र, इक्ष्वाकुवंशी आदि रूप में परिचय दिया जाता है। - ये उनके कुल–गोत्र और राजवंश को सूचित करने वाले विशेषण हैं, नाम के साथ जुड़े आते हैं।
ध्यान देने योग्य बातें
- मूल कल्पसूत्र प्राकृत में है, इसलिए वहाँ प्रमुख रूप से “रिसभ” (ऋषभ) नाम ही चलता है।
- “आदिनाथ”, “वृषभदेव”, “वृषभनाथ” आदि रूप मुख्यतः बाद के संस्कृत, हिन्दी, गुजराती टीकाओं, स्तोत्रों और जन–प्रचलन में अधिक दिखते हैं; मूल प्राकृत वाचन में प्रधान नाम रिसभ/ऋषभ ही है।
- अलग–अलग संस्करणों/टीकाओं में शब्दान्तर हो सकता है, पर व्यक्तित्व वही प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव ही हैं।
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