Snatra pooja vidhi
Snatra Pooja – सरल विधि (घर या дерासर दोनों के लिए)
नीचे बहुत सरल, सामान्य विधि दे रहा हूँ, ताकि आप आराम से स्नात्र पूजन कर सकें। परंपरा के अनुसार छोटे–मोटे अंतर हो सकते हैं (तपागच्छ, खर्तरगच्छ आदि), उन्हें आप अपने गुरु / स्थानिक पंडित से भी मिला लें।
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1. तैयारी (शरीर और स्थान)
- सुबह स्नान करें, साफ़ कपड़े (अधिकतर सफेद) पहनें।
- मुँह साफ, नाखून कटे हों, बाल सँवरे हों – स्वच्छता बहुत ज़रूरी है।
- माथे पर केसर / चंदन का चंदलो लगाएँ।
- पूजा स्थान साफ़ करें, भगवान की प्रतिमा/चित्र को ऊँचे, स्वच्छ आसन पर स्थापित करें।
- यदि संभव हो तो धूप, दीपक पहले ही जला दें।
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2. स्नात्र पूजा के लिए आवश्यक सामग्री (सामान्य)
- आष्टप्रकारी पूजा की सामग्री
- कुुसुमांजलि (फूल + चावल + केसर/सुखाद का मिश्रण)
- साफ़ पानी वाला कलश
- घंटी, चँवर (यदि उपलब्ध हो)
- साफ़ रुमाल या छोटा वस्त्र पोंछने के लिए
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3. प्रारम्भिक नमस्कार और संकल्प
- शांत बैठें, तीन बार “दिनकरनी, ॐ नमः” / “ॐ नमः सिद्धेभ्यो” बोलकर भीतर–ही–भीतर शुद्ध भाव रखें।
- मन में संकल्प लें –
- “यह स्नात्र पूजा मैं सम्यक दर्शन–ज्ञान–चारित्र की प्राप्ति के लिए, अपने पाप कर्मों के क्षय हेतु, और समग्र जीव कल्याण हेतु कर रहा/रही हूँ।”
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4. स्नात्र स्तवन और कुुसुमांजलि
- स्नात्र पूजा का मूल स्तवन शुरू करें (पुस्तक/मॉबाइल से देख कर)।
- जहाँ–जहाँ पद में “कुसुमांजलि मेलो जिनेन्द्र…” जैसे शब्द आएँ,
- वहाँ–वहाँ कुुसुमांजलि (फूल + चावल + केसर) की चुटकी लेकर - भगवान के दाएँ चरण पर या प्रतीक रूप से चरण के पास चढ़ाएँ।
- हर बार कुुसुमांजलि चढ़ाते समय अंतर में भाव रखें:
- पाप कर्मों का क्षय हो - सिद्ध पद की प्राप्ति हो - सांसारिक कष्ट और विघ्न दूर हों - समाज–संग, परिवार में शांति और सद्भाव रहे
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5. जन्म महोत्सव (भगवान के जन्म की स्मृति)
कई परंपराओं में स्नात्र स्तवन के बाद/बीच में जन्म महोत्सव की झाँकी की जाती है:
- भगवान के जन्म की आनंद–झाँकी का भाव करें:
- यदि प्रथा हो, तो थाली, घंटी, छोटे–छोटे झंडे, पंखे आदि से भगवान की आरती–झूलन जैसे उत्सव भी करते हैं।
- यह सब करते समय मन में यह भावना रहे कि:
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6. आष्टप्रकारी पूजा (यदि उसी समय कर रहे हों)
भगवान की प्रतिमा के सामने बैठकर क्रमशः भाव करें:
- जल से – “हे भगवान! जैसे जल से मल दूर होता है, वैसे मेरे अशुभ कर्म दूर हों।”
- पंचामृत से – “सम्यक दर्शन–ज्ञान–चारित्र का अमृत मुझे मिले।”
- चंदन/केसर – “मेरे राग–द्वेष शीतल हों, मन ठंडा–शांत बने।”
- फूल – “सद्गुणों के पुष्प आपके चरणों में अर्पित हों।”
- धूप – “मेरे भीतर की दुर्गंध (कषाय) नष्ट हों, सद्गंध (गुण) फैले।”
- दीपक – “अज्ञान का अँधेरा मिटे, ज्ञान का प्रकाश जागे।”
- अक्षत – “आपके समान अविनाशी सुध–आत्मा की प्राप्ति हो।”
- नैवेद्य / फल – “कर्म–रस से हटकर आत्म–रस का अनुभव हो।”
(जहाँ जल, पंचामृत आदि वास्तव में चढ़ाने हों, वहाँ–वहाँ थोड़ी मात्रा प्रतिमा के समीप अर्पित करें; घर में यदि संभव न हो तो केवल भाव से भी कर सकते हैं।)
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7. आरती और मंगल दीवो
- स्नात्र स्तवन / आष्टप्रकारी के अंत में भगवान की आरती करें।
- फिर “मंगल दीवो” / कोई मंगल गान बोलकर दीपक घुमाएँ।
- याद रखें – दीपक घुमाना कोई भगवान को “प्रकाश देना” नहीं, बल्कि यह प्रतीक है कि:
- “हे भगवान! आपके ज्ञान प्रकाश से मेरा अज्ञान हटे।”
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8. शांति कलश और चैत्य वंदन (यदि कर रहे हों)
कई स्थानों पर स्नात्र के अंत में:
- एक कलश में जल / पंचामृत भरकर, उसके आगे शांति के मंत्र या “ऊँ है श्रृ ह्रीं… शांतिकर्म” आदि (जो भी परंपरा हो) बोलते हैं।
- अंत में वह जल शिर पर या थोड़ा–सा ग्रहण करते हैं – यह “शांति–भावना” का प्रतीक है।
- फिर छोटा सा चैत्य वंदन (नमो अरिहंताणं… आदि) कर के,
- क्षमा–याचना करें –
- “पूजा के दौरान मुझसे जो भी चूक, अशुद्धि, अश्रद्धा हुई हो, उसकी क्षमा कीजिए; मुझे सम्यक मार्ग पर चलने की शक्ति दें।”
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9. स्नात्र पूजा का मुख्य भाव
पूरी पूजा में तीन मूल भाव सदा याद रखें:
- आत्म शुद्धि का भाव – बाहर की सफ़ाई के साथ–साथ भीतर के राग–द्वेष की सफ़ाई।
- तीर्थंकर के जन्म का उत्सव – केवल हर्ष नहीं, बल्कि “ऐसी अवस्था को पाने की प्रेरणा”।
- सम्यक दर्शन–ज्ञान–चारित्र की प्रार्थना –
- “मैं भी एक दिन कर्मबंधन से मुक्त, सिद्ध अवस्था को प्राप्त करूँ।”
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स्नात्र पूजा को बहुत विस्तार से, स्टेप–बाय–स्टेप देखने के लिए आप यह विस्तारपूर्वक मार्गदर्शन देख सकते हैं: “How to do Snatra Pooja”