why women not allowed to do prachhal
“Prachhal / Prakshal” से आम तौर पर मतलब होता है – भगवान की प्रतिमा पर सीधे पास जाकर जल‑अभिषेक / स्नात्र‑प्रक्षाल करना (विशेषकर वेदी पर चढ़कर किया जाने वाला प्रक्षालन).
क्यों बहुत‑सी जगहों पर स्त्रियों को नहीं करने दिया जाता? यह मुख्य रूप से परम्परा (रिवाज़) है, कोई सर्वमान्य “आगमिक सिद्धान्त” नहीं:
- शारीरिक‑शुचिता की पारम्परिक धारणाएँ
- पुराने समय से भारतीय समाज में (सिर्फ जैनों में नहीं) यह मान्यता रही कि स्त्री शरीर में मासिक धर्म आदि के कारण “निरन्तर अशुचि की सम्भावना” रहती है। - इसी के आधार पर कुछ आचार्य व समाजों ने कहा: “जहाँ प्रतिमा पर प्रत्यक्ष जल‑अभिषेक होता है (वेदी पर बहुत पास से), वहाँ केवल पुरुष ही प्रक्षाल करें।”
- स्थानीय नियम और आचार‑ग्रन्थों की व्याख्या
- कुछ दिगम्बर समाजों में आचार‑ग्रन्थों की कड़ी व्याख्या करके स्त्री‑प्रक्षाल पर रोक रखी गई है। - कई श्वेताम्बर मन्दिरों में, और आज कई दिगम्बर स्थानों पर भी, स्त्रियाँ बिना रोक‑टोक प्रक्षाल / अभिषेक करती हैं। - यानी यह सब जगह एक‑जैसा नियम नहीं है; यह मन्दिर‑प्रबन्धक समिति व आचार्य परम्परा के निर्णय पर चलता है।
- आत्मा के स्तर पर कोई हीनता नहीं
- जैन दर्शन के अनुसार स्त्री‑पुरुष दोनों की आत्मा समान है, दोनों के लिए सम्यक् दर्शन‑ज्ञान‑चारित्र, मोक्ष‑मार्ग एक ही है। - इसलिए यह प्रतिबन्ध “आत्मा नीची है” के कारण नहीं, बल्कि शारीरिक‑शुचिता और सामाजिक परम्परा के तर्क से लगाया गया है।
- आज की स्थिति
- बहुत‑सी जगह अब यह प्रश्न उठ रहा है कि जब स्त्रियाँ पूजा, स्वाध्याय, व्रत, दान सब कर सकती हैं, तो प्रक्षाल क्यों नहीं? - इसलिए कई नये मन्दिरों और कुछ पुराने स्थानों पर भी नियम बदले जा रहे हैं, और स्त्रियों को भी प्रक्षाल की अनुमति दी जा रही है। - फिर भी, जहाँ परम्परा अभी भी कड़ी है, वहाँ समिति/आचार्य के निर्णय तक वही नियम चलता है।
संक्षेप में: स्त्रियों को प्रच्छाल न करने देना जैन दर्शन का सार्वभौम शास्त्रीय निषेध नहीं, बल्कि कुछ संप्रदायों / क्षेत्रों की पुरानी सामाजिक‑परम्परा और शुचिता‑सम्बन्धी धारणाएँ हैं। जैन सिद्धान्त के अनुसार स्त्री और पुरुष – दोनों की आत्मा समान रूप से शुद्धि और मोक्ष के अधिकारी हैं।