prasham ka arth
“प्रशम” (संस्कृत: praśama) का अर्थ है – भीतर की अशांति, क्रोध, मान, माया, लोभ आदि कषायों का पूरी तरह शांत हो जाना।
सरल शब्दों में:
- मन का शान्त, स्थिर और प्रसन्न हो जाना
- बदला, गुस्सा, चिड़चिड़ापन, चिंता, डर आदि भावों का ठंडा पड़ जाना
- आत्मा के स्वभाव में टिके रहने से जो गहरी शांति मिलती है, उसे ही प्रशम कहते हैं
जैन धर्म में प्रशम का मतलब केवल चुप रह जाना नहीं, बल्कि ऐसा अन्तरिक संयम और शान्ति, जिसमें किसी के लिए द्वेष न हो, लोभ न हो, और मन बार‑बार विचलित न हो।