Snatra Pooja hindi
यहाँ मैं स्नात्र पूजा का सरल परिचय और मुख्य हिन्दी पाठ का एक संक्षिप्त रूप दे रहा हूँ, ताकि आप घर या मंदिर में आसानी से कर सकें। (पूरा सम्पूर्ण ग्रंथ बहुत लंबा है, इसलिए यहाँ संक्षिप्त, पारंपरिक रूप दे रहा हूँ।)
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1. स्नात्र पूजा क्या है? (संक्षेप में)
- यह तीर्थंकर भगवान के जन्म‑कल्याणक के समय इन्द्र द्वारा किए गए अभिषेक (स्नान) की स्मृति में की जाने वाली पूजा है।
- इसमें भगवान की प्रतिमा पर जल/पंचामृत अभिषेक, स्तुति, और अंत में मंगल कामनाएँ की जाती हैं।
- श्वेताम्बर परम्परा में इसे रोज सुबह मन्दिर में करना बहुत प्रचलित है।
थोड़ा विस्तार से पढ़ना चाहें तो यहाँ देख सकते हैं
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2. स्नात्र पूजा – सरल विधि (हिन्दी मिश्रित)
(क) प्रारंभ
- शुद्धि
- स्नान करके, साफ़ सफेद या हल्के रंग के वस्त्र पहनें। - वेदी/चौकी साफ़ करें, भगवान की मूर्ति सामने रखें।
- नवकार मंत्र (३ बार)
```text णमो अरिहंताणं णमो सिद्धाणं णमो आयरियाणं णमो उवज्जायाणं णमो लोए सव्वसाहूणं एसो पंच णमोकारो सव्व पावप्पणासणो मंगलाणं च सव्वेसिं पदमं हवई मंगलं ॥ ```
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3. मुख्य स्तवन / श्लोक (हिन्दी अर्थ सहित)
1) सरस शांति सुधा रस सागरम्…
```text सरस शांति सुधारस सागरम्, शुचि-तरं गुणरत्न-महा गारम्। भाविक पंकज बोध दिवाकरम्, प्रतिदिनं प्रणमामि जिनेश्वरम्॥१॥ ```
अर्थ (सरल): मैं उन जिनेश्वर भगवान को प्रतिदिन प्रणाम करता हूँ जो शांति के सागर, पवित्र गुणों के अनमोल रत्नों का खज़ाना, और भावुक भक्तों के लिए ज्ञान‑सूर्य हैं।
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2) कुसुमाभरण उतारीने…
```text कुसुमाभरण उतारीने, पड़ि मधुरे विभूषण ले, मज्जन पीठे स्थापित करके, करिए जल अभिषेक॥२॥ ```
अर्थ: हम पहले भगवान की प्रतिमा पर लगे पुराने फूल‑आभूषण को विनम्रता से हटाते हैं, फिर स्नान के आसन पर विराजमान करके, भगवान पर शुद्ध जल से अभिषेक करते हैं।
(यहाँ आप भगवान के दाहिने चरण‑अंगूठे पर जल से अभिषेक करते हैं, फिर पूरा अभिषेक कर सकते हैं।)
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3) जिन जन्म समये मेरु शिखरे…
```text जिन जन्म समये मेरु शिखरे, रत्न कलश ले देव, देव–असुर सब मिलकर, करते थे सेवा सेव॥३॥ ```
अर्थ: जब तीर्थंकर भगवान का जन्म हुआ, तब मेरु पर्वत की चोटी पर इन्द्रादि देवों ने रत्नों से भरे कलशों द्वारा भगवान का दिव्य अभिषेक किया – हम उसी की स्मृति में यह स्नात्र कर रहे हैं।
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4) निर्मल जल कलश नवहरावे…
```text निर्मल जल कलश नवहरावे, वस्त्र-अमूलक अंग धरावे, कुसुमांजलि मेलो आदि जिनानंद, सिद्धस्वरूप अंग पखारो॥४॥ ```
अर्थ: हम निर्मल जल से भगवान को स्नान कराते हैं, शुद्ध वस्त्र और अलंकार अर्पित करते हैं, और कहते हैं – “हे आदिनाथ जिनानंद प्रभु! हम आपको कुसुमांजलि अर्पित करते हैं; आप सिद्धस्वरूप हैं, हमें भी आत्म‑पवित्रता का मार्ग दें।”
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4. स्नात्र पूजा के अंत की प्रार्थना (सरल हिन्दी)
अभिषेक और स्तवन के बाद आप इस प्रकार प्रार्थना कर सकते हैं:
```text हे अरिहंत परमात्मा! आज की इस स्नात्र पूजा के द्वारा हमने आपके जन्म-अभिषेक की पावन स्मृति की।
जैसे इन्द्रादि देवों ने आपके निर्मल शरीर पर जल-अभिषेक किया, वैसे ही हमारे क्रोध, मान, माया, लोभ के कलंक धुल जाएँ।
हमें सम्यक दर्शऩ, सम्यक ज्ञान और सम्यक चारित्र की शक्ति और प्रेरणा मिले, और सभी जीवों के प्रति अहिंसा, करुणा और मैत्री का भाव जागृत रहे।
सभी जीव सुखी हों, सभी जीव निरोग हों, सभी जीवों में क्षमा और शांति का वास हो॥ ```
अंत में फिर से नवकार मंत्र बोलें और क्षमा‑याचना करें: “आज की पूजा में जाने‑अनजाने जो भी दोष हुए हों, उनके लिए मैं सभी से क्षमा माँगता/माँगती हूँ।”
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यदि आप चाहें तो मैं अगली बार
- पूरी श्वेताम्बर स्नात्र पूजा (पूरा पाठ)
- केवल बहुत छोटा, 5–10 मिनट का “घर पर करने लायक” हिन्दी स्नात्र पूजन