Shaayari on tapashya
नीचे कुछ सरल शायरियाँ / पंक्तियाँ तपस्या (तप) पर, जैन दृष्टि से:
- भूख से नहीं, भाव से जब मन को तृप्त किया,
तप बन गया वो क्षण, जब कर्मों को क्षीण किया।
- जिसने राग-द्वेष को हँस कर त्याग दिया,
उसने ही सच्चे तप का सुन्दर शुभ ध्वज साध लिया।
- तप ये नहीं बस उपवासों की गिनती का नाम,
तप है भीतर शान्ति जागे, मिट जाए सारा ग्राम्य भ्रम-धाम।
- तप में जब समता का निर्मल दीप जले,
संसार के बन्धन एक-एक कर के ढलें।
- जो अपमान सह कर भी मन को न मलिन होने दे,
ऐसी धीर तपस्वी आत्मा, मोक्ष-पथ को सोने दे।
- कड़वा लगे आरम्भ में, पर अमृत फल दे जाए,
सच्ची तपस्या वही, जो अहंकार भी खा जाए।
- केवल शरीर का नहीं, मन-वचन का भी तप हो,
हर क्षण में क्षमा, मृदुता, यही सच्चा अनुत्तम तप हो।
- तप वो नहीं जो दिख जाए जग की आँखों को,
तप वो जो शान्त करे अपने ही विकराल विचारों को।
आप चाहें तो मैं इन्हें छंदबद्ध करके या किसी विशेष शैली (ग़ज़ल / दोहा / चौपाई) में भी ढाल सकता हूँ, या बच्चों के लिए और भी सरल कर सकता हूँ।