jain agam sahitya
“जैन आगम साहित्य” से मतलब है – भगवान महावीर के उपदेशों पर आधारित, प्राचीन जैन धर्मग्रंथों का समूचा संग्रह।
1. “आगम” क्या है?
- आगम = जिनवाणी
- बाद में इन्हीं उपदेशों को सूत्रों के रूप में संकलित किया गया – इन्हें ही आगम या जिनागम कहते हैं।
2. श्वेतांबर परंपरा में आगम
श्वेतांबर परंपरा में मुख्यतः आगम को 6 वर्गों में बताया जाता है:- अंग आगम – 11 अंग (आचारांग, सूत्रकृतांग, स्थानांग आदि)
- उपांग आगम – अंगों की विस्तृत व्याख्या
- चूलिका / मूलसूत्र – छोटे, व्यवहारिक सूत्र (जैसे दशवैकालिक, उत्तराध्ययन आदि)
- प्रकीर्णक – विविध विषयों पर छोटे ग्रंथ
- चेदसूत्र – साधु-साध्वी की अनुशासन व्यवस्था
- नंदी, अनुरोधराध्ययन आदि – ज्ञान, दर्शन आदि पर विशेष ग्रंथ
ये सब मिलकर श्वेतांबर जैन आगम साहित्य कहलाते हैं और जिनवाणी के मुख्य लिखित आधार माने जाते हैं।
3. दिगंबर परंपरा में दृष्टि
- दिगंबर परंपरा मानती है कि मूल आगम (अंगादि) कालान्तर में लुप्त हो गए।
- इसलिए आज जो ग्रंथ अधिक मान्य हैं, वे हैं:
- दिगंबर इन्हें आगम परंपरा से निकला सिद्धांत मानते हैं, पर “वर्तमान उपलब्ध अंग-आगम” को पूर्ण रूप से प्रामाणिक नहीं मानते।
4. आगम साहित्य की मुख्य विशेषताएँ
- तीन रत्न (सम्यक दर्शन, सम्यक ज्ञान, सम्यक चरित्र) की स्पष्ट शिक्षा
- अहिंसा, अनेकांतवाद, अपरिग्रह का विस्तार से वर्णन
- साधु-साध्वी के लिए आचार-संहिता,
- कर्म सिद्धांत, जन्म–मरण, लोक रचना, नरक–देवलोक, मोक्ष मार्ग आदि का विज्ञानपूर्ण विश्लेषण।
5. संक्षेप में
- जैन आगम साहित्य = भगवान महावीर की दिव्य वाणी की पारंपरिक, सूत्र–रूप, लिखित धरोहर।
- श्वेतांबर इसे वर्तमान आगम-ग्रंथों के रूप में मानते हैं।
- दिगंबर मानते हैं कि मूल अंग लुप्त हो गए, पर उनकी परंपरा में सुरक्षित सिद्धांतों पर आधारित ग्रंथ ही आज मार्गदर्शक हैं।
यही पूरा संग्रह, जो जिनवाणी पर आधारित है, “जैन आगम साहित्य” कहलाता है।